Ekadashi par chawal kyun nahi khate: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को बेहद पवित्र और फलदायी माना गया है। यह दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। पंचांग के अनुसार, हर महीने दो एकादशी आती हैं, एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में। वहीं, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है, जो इस बार 13 फरवरी को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से भगवान विष्णु का पूजन करता है और व्रत रखता है, उसे मृत्यु के बाद बैकुंठ धाम में स्थान मिलता है। हालांकि यह व्रत कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। इसमें कई नियमों का पालन करना पड़ता है। इन्हीं नियमों में एक नियम चावल का सेवन न करना है। तो चलिए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा…

जानें पौराणिक कथा

अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर एकादशी के दिन चावल खाना क्यों वर्जित माना गया है? दरअसल, कथा के अनुसार, एक बार माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने अपना शरीर त्याग दिया। जब उन्होंने देह का परित्याग किया, तो उनके शरीर के अंश धरती में समाहित हो गए। जहां-जहां उनके शरीर के अंश गिरे, वहां से जौ और चावल उत्पन्न हुए। चूंकि ये अनाज महर्षि के शरीर के अंश से पैदा हुए थे, इसलिए इन्हें ‘जीव’ के समान माना गया।

‘जीव’ स्वरूप माने जाते हैं जौ और चावल

धार्मिक मान्यता है कि एकादशी के दिन जौ और चावल सजीव रूप में होते हैं। इस कारण इस दिन इनका सेवन करना महर्षि मेधा के शरीर के अंश का सेवन करने के समान माना गया है। विशेष रूप से चावल खाने को निषिद्ध बताया गया है। पद्म पुराण और विष्णु पुराण में उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति एकादशी के दिन चावल खाता है, उसके पुण्य फलों का नाश हो जाता है। यही वजह है कि इस दिन लोग चावल का सेवन नहीं करते हैं।

विजया एकादशी का विशेष महत्व

फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है। ‘विजया’ का अर्थ है विजय प्राप्त करना। मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति को हर कार्य में सफलता मिलती है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि भगवान राम ने भी लंका पर चढ़ाई से पहले विजया एकादशी का व्रत किया था, जिससे उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त हुई। इस दिन प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। उन्हें पीले फूल, तुलसी दल और फल अर्पित किए जाते हैं। विष्णु सहस्रनाम का पाठ और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है।

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डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।