Vat Savitri Vrat 2026 (वट सावित्री व्रत कब है):  हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं और वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की विधिवत पूजा करने के बाद अपना व्रत खोलती हैं। इस साल अधिक मास होने के कारण ज्येष्ठ मास की दो अमावस्या तिथि पड़ने वाली है। ऐसे में केवल ज्येष्ठ अमावस्या के दिन ही व्रत रखना लाभकारी हो सकता है। वट सावित्री व्रत को बड़मावस और बरगदाही के नाम से भी जाना जाता है। बता दें कि इस वर्ष अमावस्या तिथि दो दिन होने के कारण वट सावित्री व्रत की तिथि को लेकर असमंसज की स्थिति बनी हुई है। आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि से लेकर धार्मिक महत्व तक…

कब है वट सावित्री व्रत 2026? (Vat Savitri Vrat 2026)

ज्येष्ठ अमावस्या तिथि आरंभ– 16 मई 2026 को 05:11 ए एम बजे
ज्येष्ठ अमावस्या तिथि समाप्त – 17 मई 2026 को 01:30 ए एम बजे
वट सावित्री व्रत 2026 तिथि- 16 मई 2026, शनिवार

वट सावित्री व्रत 2026 पूजा समय (Vat Savitri Vrat 2026 Puja Muhurat)

वट सावित्री व्रत पर पूजा के लिए सबसे उत्तम समय सुबह 07:12 बजे से 08:24 बजे तक है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त में भी पूजा की जाती है, जो सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक है।

वट सावित्री व्रत 2026 का शुभ मुहूर्त (Vat Savitri Vrat 2026 Shubh Muhurat)

ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:07 से 4:48 तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 2:04 से 3:28 तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 7:04 से 7:25 तक

वट सावित्री 2026 पर बन रहा खास योग (Vat Savitri Vrat 2026 Shubh Yog)

इस साल वट सावित्री व्रत पर शनि जयंती के साथ सौभाग्य योग और शोभन योग का निर्माण हो रहा है। इसके अलावा ग्रहों की स्थिति के कारण बुधादित्य, नवपंचम, गजलक्ष्मी, विपरीत राजयोग जैसे राजयोगों का निर्माण हो रहा है।

वट सावित्री व्रत 2026 पूजा विधि (Vat Savitri Vrat 2026 Puja Vidhi)

इस दिन सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद आटा की 14 पूड़ी और थोड़े गुड़ और आटा के गुलगुले बना लें। इसके साथ ही भिगोए हुए चावल को पीस लें। इसके बाद पूजा की थाली सजा लें। अब स्वयं सोलह श्रृंगार करके बरगद के पेड़ की पूजा करने के लिए जाएं। अब वट वृक्ष में जल अर्पित करें और फिर फिर फूल, माला, सिंदूर, अक्षत, मिठाई, खरबूज, सेब आदि अन्य मिठाई और फल, 14 पूड़ियां लेकर हर एक पूड़ी में 2 भिगोए हुए चने और आटा-गुड़ के बने गुलगुले रख दें और इसे बरगद की जड़ में रख दें। इसके साथ ही बांस का पंखा रख दें और फिर जल अर्पित कर दें। अब घी का दीपक और धूप जला लें। इसके बाद सफेद सूत का धागा या फिर सफेद नार्मल धागा, कलावा आदि लेकर वृक्ष के चारों ओर परिक्रमा करते हुए बांध दें। 5 से 7 या फिर अपनी श्रद्धा के अनुसार परिक्रमा कर लें। इसके बाद बचा हुआ धागा वहीं पर छोड़ दें। अब व्रत कथा पढ़ें या फिर सुने। सुनते समय हाथों में भिगोए हुए चना ले लें। कथा श्रद्धापूर्वक सुनने के बाद वट में चने अर्पित कर लें। कथा सुनने के बाद सुहागिन महिलाएं माता पार्वती और सावित्री के को चढ़ाए गए सिंदूर को तीन बार लेकर अपनी मांग में लगा लें। फिर विधिवत आरती करके भूल चूक के लिए माफी मांग लें। फिर चने के सात दाने और बरदग के पेड़ की एक कोपल लेकर अपना व्रत खोल लें।

वट सावित्री की पूजा में इस मंत्र का करें जाप (Vat Savitri Vrat 2026 Mantra)

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते।।
यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा।।

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डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।