वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प से अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे, तभी से यह व्रत श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर कथा सुनती हैं और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से किए गए इस व्रत से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इस साल वट सावित्री व्रत पर शनि अमावस्या, शनि जंयती और ज्येष्ठ अमावस्या का संयोग बन रहा है। वहीं कई अन्य शुभ योग भी बन रहे हैं। आइए जानते हैं तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त…
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वट सावित्री व्रत कब है (Kab Hai vat savitri vrat)
फ्यूचर पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को वट सावित्री व्रत मनाया जाता है। इस बार अमावस्या तिथि 16 मई, शनिवार को सुबह 5 बजकर 11 मिनट पर लगेगी और रात में 1 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। यानी 16 मई को ही वट सावित्री का व्रत किया जाएगा।
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वट सावित्री व्रत पूजा मुहूर्त
शनिवार के दिन अमावस्या तिथि होने से वट सावित्री व्रत पर शनि अमावस्या का भी संयोग बन गया है। इस दिन पूजा के लिए शुभ समय अभिजीत मुहूर्त का रहेगा। सुहागिन महिलाएं 16 मई को सुबह 11 बजकर 51 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 45 मिनट तक शुभ मुहूर्त में पूजा कर सकती हैं।
वट सावित्री व्रत की पूजा- विधि
वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ या नए वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थान को साफ करके भगवान विष्णु, माता सावित्री और सत्यवान की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। व्रत का संकल्प लेकर निर्जला या फलाहार व्रत रखें। फिर बरगद के पेड़ के पास जाकर जल, रोली, अक्षत, फूल, भीगा हुआ चना, मिठाई और सूत अर्पित करें। पेड़ की जड़ में जल चढ़ाकर दीपक जलाएं और सावित्री-सत्यवान की कथा का पाठ या श्रवण करें। इसके बाद वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटें और पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि तथा अखंड सौभाग्य की कामना करें। अंत में भगवान से प्रार्थना करके आरती करें और जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देने के बाद व्रत का पारण करें।
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वट सावित्री व्रत पूजा सामग्री
वट सावित्री व्रत की पूजा सामग्री में सबसे पहले वट वृक्ष (बरगद) की पूजा के लिए कच्चा सूत या मौली, जल से भरा लोटा, गंगाजल, रोली, हल्दी, कुमकुम, अक्षत (चावल), फूल, माला, दूर्वा और पान के पत्ते शामिल किए जाते हैं। इसके अलावा पूजा में धूप, दीपक, रुई, घी या तेल, अगरबत्ती, नारियल, सुपारी, लौंग, इलायची, कपूर, फल, मिठाई, भीगे हुए चने, बताशे और पंचामृत भी रखा जाता है। सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, चुनरी और कंघी का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा के दौरान सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने के लिए पूजा की किताब या कथा पत्र भी साथ रखें।
वट सावित्री व्रत की आरती
आरती वट सावित्री और वट वट वृक्ष की।
अश्वपती पुसता झाला।। नारद सागंताती तयाला।।
अल्पायुषी सत्यवंत।। सावित्री ने कां प्रणीला।।
आणखी वर वरी बाळे।। मनी निश्चय जो केला।।
आरती वडराजा।।1।।
दयावंत यमदूजा। सत्यवंत ही सावित्री।
भावे करीन मी पूजा। आरती वडराजा ।।धृ।।
ज्येष्ठमास त्रयोदशी। करिती पूजन वडाशी ।।
त्रिरात व्रत करूनीया। जिंकी तू सत्यवंताशी।
आरती वडराजा ।।2।।
स्वर्गावारी जाऊनिया। अग्निखांब कचळीला।।
धर्मराजा उचकला। हत्या घालिल जीवाला।
येश्र गे पतिव्रते। पती नेई गे आपुला।।
आरती वडराजा ।।3।।
जाऊनिया यमापाशी। मागतसे आपुला पती। चारी वर देऊनिया।
दयावंता द्यावा पती।
आरती वडराजा ।।4।।
पतिव्रते तुझी कीर्ती। ऐकुनि ज्या नारी।।
तुझे व्रत आचरती। तुझी भुवने पावती।।
आरती वडराजा ।।5।।
पतिव्रते तुझी स्तुती। त्रिभुवनी ज्या करिती।। स्वर्गी पुष्पवृष्टी करूनिया।
आणिलासी आपुला पती।। अभय देऊनिया। पतिव्रते तारी त्यासी।।
डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।
