Vastu Tips For Main Door (मुख्य द्वार के वास्तु नियम): वास्तु शास्त्र में घर के मुख्य द्वार का विशेष महत्व है। इसकी सही दिशा से लेकर स्थान का होना अत्यंत जरूरी है, क्योंकि इसी के द्वारा घर में सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती हैं। जिसका असर घर में मौजूद हर चीजों के साथ घर-परिवार के सदस्यों के जीवन में देखने को मिलता है। इसके अलावा वास्तु दोष का कारण बन सकता है। ‘वास्तु चिंतामणि’ ग्रंथ के अनुसार, वास्तु निर्माण करते समय सभी भागों का अपना-अपना महत्व होता है। अन्य अंगों की तरह दरवाजे या द्वार बनाते समय भी दिशाओं का विचार करना पड़ता है। ऐसा करने से शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है। जैन वास्तु शास्त्र के मत से आवश्यकतानुसार चारों ही दिशाओं में लगाया जा सकता है। किंतु उनके स्थान का निर्धारण आवश्यक है। आइए जानते हैं घर के मुख्य द्वार बनाते समय दिशाओं का क्यों रखें ख्याल…

पुव्वाइ विजयद्वारं जम्भारं दाहिणाइ भवयं।
अवरेसु मकरद्वारं उच्छीए कुबेरद्वारं उड्डीए।।
माणुसाणं फलमेसिं द्वारं न कदावि दाहिणे कुव्वन्ता।
जहं होइ कारणेण तं उच्छे चउदिसि अट्ठभागं कप्पेत्ता।।
सुहं द्वारं असुहं चउसुं पि दिसासु अट्ठभागासु।
चउ लिय छ पण लिय पण लिय पुव्वाह सुकम्मेण।।
वास्तुसार (गाथा 109 से 111)

अर्थ-

पूर्व दिशा के द्वार को विजय द्वार, दक्षिण द्वार को यम द्वार, पश्चिम द्वार को मकर द्वार तथा उत्तर द्वार को कुबेर द्वार कहते हैं। ये सभी नामानुसार फलदायी हैं। अतः दक्षिण दिशा में द्वार कभी न बनाना चाहिए। यदि बनाना आवश्यक हो तो मध्य भाग में नहीं बनाएं। पूर्व दिशा के आठ भागों में से तीसरे या चौथे भाग में तथा दक्षिण दिशा में दूसरे या छठवें भाग में द्वार निर्माण उपयुक्त होता है।

जानिए मुख्य द्वार किस दिशा में होना होगा बेहतर

पूर्व द्वार में मुख्य द्वार

इसे विजय द्वार कहा जाता है, जो सबसे उत्तम माना जाता है। पूर्व दिशा के आठ भागों में से तीसरे और चौथे भाग में द्वार बनवाना चाहिए। इस दिशा से आने वाली किरणों और ऊर्जा का असर स्वास्थ्य, मनस्थिति, ज्ञान, लौकिक बुद्धि में अधिक देखने को मिल सकता है। इस दिशा में द्वार होने से धन-धान्य, यश आदि की प्राप्ति हो सकती है। इसके साथ ही पद-प्रतिष्ठा, यश-सम्मान के साथ ज्ञान और अनुशासन की भी वृद्धि हो सकती है।

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Vastu Tips For Main Door: जानें वास्तु के हिसाब से किस दिशा में बनवाएं मुख्य द्वार (इमेज सोर्स- AI)

दक्षिण द्वार में मुख्य द्वार

दक्षिण दिशा की ओर होने वाले द्वार को दक्षिण द्वार कहा जाता है। इसे यम द्वार भी कहते हैं, क्योंकि ये दिशा यमराज की होती है। इसी के कारण इस दिशा की ओर मुख्य द्वार बनाना अशुभ माना जाता है। इस दिशा में द्वार होने से अशुभ घटनाएं हो सकती है जो वाहन दुर्घटना, व्याधि, बीमारी, आर्थिक हानि आदि हो सकती है। इसलिए इस दिशा में द्वार न बनवाएं। अगर आपको इसी दिशा में ही मुख्य द्वार बनाना पड़ रहा है, तो पूरे भाव के दूसरे और छठवें भाग में बनाना चाहिए। एक अन्य मतानुसार चतुर्थ, पंचम या षष्ठम भाग में दक्षिण द्वार बना सकते हैं। चतुर्थ भाग में यश प्राप्ति, पंचम में धन प्राप्ति तथा षष्ठम में यश प्राप्ति होती है।

पश्चिम द्वार में मुख्य द्वार

पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार होने के मकर द्वार भी कहा जाता है। इस दिशा में मुख्य द्वार होने से मध्यम लाभ मिल सकता है। पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार होने पर व्यक्ति के मन में मोह, क्रोध और बेचैनी बढ़ सकती है। कई बार मेहनत और अवसर मिलने के बावजूद अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए यदि पश्चिम दिशा में द्वार बनाना आवश्यक हो, तो उसे उस दिशा के तीसरे या पांचवें भाग में बनाना शुभ माना गया है।

अन्य मतानुसार पश्चिम दिशा के आठ भागों में से तीसरे, चौथे, पांचवें या छठवें भाग में द्वार बना सकते हैं। इसके अलावा तीसरे भाग में देवालय बनने से धन प्राप्ति, चतुर्थ भाग में यश प्राप्ति, पंचम भाग से संतान प्राप्ति तथा छठे भाग से लाभ होता है।

उत्तर द्वार में मुख्य द्वार

उत्तर दिशा के द्वार को कुबेर द्वार कहा जाता है। ये सबसे श्रेष्ठ होता है। इस दिशा में मुख्य द्वार होने से यश, सुख, भाग्य, सिद्धियां, बलवान, व्यापार, प्रगति और समृद्धि में वृद्धि हो सकती है। इसके तीसरे या पांचवें भाग में द्वार निर्माण उपयुक्त है। अन्य मतानुसार चौथे, पांचवें व छठवें भाग में द्वार निर्माण करवाया जा सकता है। चतुर्थ भाग में द्वार बनाने से संतान वृद्धि, पांचवें भाग में द्वार होने से सुख की प्राप्ति तथा छठवें भाग में द्वार होने से राज प्रतिष्ठा, मान सम्मान की प्राप्ति होती है।

उप दिशाओं में मुख्य प्रवेश द्वार होने से लाभ

वास्तु चिंतामणि में मुख्य दिशाओं में मुख्य द्वार होने के अलावा विदिशाओं में द्वार होने के भी लाभ और हानि बताएं है।

ईशान दिशा:  उत्तर और पूर्व दिशा के बीच के कोने को ईशान कोण कहा जाता है। इस दिशा में मुख्य प्रवेश द्वार होने से ऐश्वर्य लाभ, वंश वृद्धि, सुयश तथा यश की अप्रतिम प्राप्ति हो सकती है।

आग्नेय दिशा:  पूर्व और दक्षिण के बीच की दिशा को आग्नेय दिशा कहा जाता है। इस दिशा में  मुख्य प्रवेश द्वार होने से रोग, अग्निभय, आतंकवाद आदि की संभावनाएं रहती हैं।

नैऋत्य दिशा: दक्षिण-पश्चिम के बीच की दिशा यानी नैऋत्य दिशा में मुख्य प्रवेश द्वार होने से अकाल मरण, आत्मघात, मृत्युतुल्य कष्ट अथवा परिवार की ही संभावना रहती है।

वायव्य दिशा: उत्तर और पश्चिम दिशा के बीच मुख्य प्रवेश द्वार होने से वायु एक द्वारे से दूसरे द्वार में अति तीव्र हो जाती है। आय से अधिक व्यय तथा मानसिक अशांति होती है।

डिस्क्लेमर: यह जानकारी पारंपरिक वास्तुशास्त्र और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित मान्यताओं पर आधारित है। इसके शुभ-अशुभ प्रभावों के संबंध में विभिन्न मत और व्याख्याएं प्रचलित हैं। वास्तु नियमों को आस्था और परंपरा के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। किसी भी प्रकार के निर्माण, वास्तु परिवर्तन या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले योग्य वास्तु विशेषज्ञ, वास्तुकार या संबंधित पेशेवर से सलाह अवश्य लें।