Dev Diwali 2017 Varanasi Puja Vidhi, Muhurat and Kartik Purnima Puja Katha in Hindi: why we celebrate Dev Diwali festival in Varansi - देव दिवाली 2017: जानिए क्यों वाराणसी में गंगा किनारे मनाई जाती है देवों की दिवाली - Jansatta
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देव दिवाली 2017: जानिए क्यों वाराणसी में गंगा किनारे मनाई जाती है देवों की दिवाली

Dev Diwali 2017 Puja Vidhi, Muhurat: काशी के रविदास घाट से लेरप राजघाट तक लाखों दीए जलाए जाते हैं, गंगा के तटों पर जल रहे दीए ऐसी अनुभूति करवाते हैं कि अकाशगंगा जमीन पर आ गई हो।

Dev Diwali 2017 Puja Vidhi: वाराणसी में क्यों महत्वपूर्ण हे देवों की दिवाली, क्या है मान्यता।

कार्तिक माह में अनेको पर्व मनाए जाते हैं जिसके कारण पूरे वर्ष सकारात्मक कार्य करने की उर्जा मिलती है। कार्तिक माह की अमावस्या को दिवाली का पर्व मनाया जाता है और इन पांच दिनों के उत्सव में हर कोई उत्सवों का लुत्फ उठाता है। दिवाली के ठीक 15 दिनों बा कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन देव दिवाली मनाई जाती है। इस पर्व का विशेष महत्व भारत देश के उत्तर प्रदेश के वाराणसी राज्य से है। वाराणसी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। इस दिन भोलेनाथ के सभी भक्त एक साथ माता गंगा के घाट पर लाखों दीए जला कर देव दीवाली का उत्सव मनाते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन काशी के घाटों पर सभी देव उतर कर भगवान शिव की विजय की खुशी में दिवाली मनाते हैं। इस दिन माता गंगा की पूजा की जाती है। काशी के रविदास घाट से लेरप राजघाट तक लाखों दीए जलाए जाते हैं। गंगा के तटों पर जल रहे दीए ऐसी अनुभूति करवाते हैं कि अकाशगंगा जमीन पर आ गई हो, एक कहावत के अनुसार कहा जाता है कि दिवाली मनाए अपने घर और देव दिवाली काशी में मनानी चाहिए।

वाराणसी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है, काशी के लिए मान्यता है कि उसपर भगवान शिव की विशेष कृपा है। देव दिवाली वाराणसी में मनाने के पीछे की कथा भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता है कि त्रिपुरासुर के दैत्य से तीनों लोक आतंकित था। देवताओं को परेशान करने के लिए त्रिपुरासुर ने स्वर्ग लोक पर भी अपना कब्जा जमा लिया था। माना जाता है कि त्रिपुरासुर ने प्रयाग में ही काफी दिनों तक तप किया था और उसके इस तप के कारण तीनों लोक जलने लगे। इसके बाद ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिया और वरदान मांगने के लिए कहा, उसने कहा कि उसे कोई देवता, पुरुष, स्त्री, जीव, जंतु, पक्षी, निशाचर ना मार पाए। इस वरदान को पाने के बाद त्रिपुरासुर अमर हो गया। कोई भी देव उसे नहीं मार सकता था, इसलिए विष्णु ने भी उसका वध करने से मना कर दिया, लेकिन विष्णु ने सभी देवों को शिव के पास जाने के लिए कहा।

ब्रह्मा जी और सभी देव भगवान शिव के पास पहुंचे और त्रिपुरा के वध के लिए उनसे प्रार्थना की। महादेव तीनों लोकों में त्रिपुरासुर को ढूंढने के लिए निकल पड़े। इसके बाद कार्तिक पूर्णिमा के दिन महादेव ने प्रदोषकाल के समय अर्धनारीश्वर के रुप में त्रिपुरासुर का वध कर दिया। इस के बाद काशा में सभी देवताओं ने विजय की खुशी में दीप जला कर दिवाली मनाई। सबसे पहली बार 1915 में हजारों की संख्या में दीपक जलाकर देव दिवाली मनाई गई।

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