Adhik Maas Varad Vinayak Chaturthi Vrat Katha: अधिक मास की वरद विनायक चतुर्थी भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए बेहद शुभ मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और व्रत कथा का पाठ करने से भक्तों के जीवन से विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। गणपति बप्पा अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं और घर में सुख, शांति व सकारात्मक ऊर्जा का वास बना रहता है। ऐसे में वरद विनायक चतुर्थी के दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ इस पावन कथा का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इस साल वरद चतुर्थी का व्रत 20 मई को रखा जाएगा। आइए जानते हैं व्रत कथा के बारे में…

वरद विनायक चतुर्थी व्रत कथा 2026 (Adhik Maas Varad Vinayak Chaturthi Vrat Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे। वहां माता पार्वती ने शिव जी से चौपड़ खेलने की इच्छा जताई। दोनों ने खेलना शुरू किया, लेकिन इस खेल में हार-जीत तय करने के लिए भगवान शिव ने पास पड़े तिनकों से एक बालक का पुतला बनाकर उसमें प्राण प्रतिष्ठा की और भगवान शिव ने उस बालक से कहा कि तुम बताना कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता। तीन बार खेले गए इस खेल में माता पार्वती लगातार जीतती रहीं, लेकिन बालक ने हर बार महादेव को विजयी घोषित कर दिया। यह बात पार्वती जी को बहुत बुरी लगी और उन्होंने गुस्से में उस बालक को श्राप दे दिया कि वह लंगड़ा हो जाएगा और कीचड़ में पड़ा रहेगा।

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बालक ने मां पार्वती से माफी मांगी और कहा कि उससे यह गलती अज्ञानवश हुई है। इस पर माता का दिल पिघला और उन्होंने कहा कि जब यहां नागकन्याएं आएंगी, तो उनके बताए अनुसार भगवान गणेश का 21 दिन का व्रत करो, इससे तुम्हारे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। इसके बाद मां पार्वती चली गईं।

करीब एक साल बाद वहां नागकन्याएं आईं और उन्होंने बालक को गणेश पूजन की विधि बताई। बालक ने 21 दिन तक पूरे नियम और श्रद्धा से व्रत किया। भगवान गणेश प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। बालक ने प्रार्थना की कि उसे इतनी शक्ति मिले कि वह अपने पैरों पर चलकर कैलाश पर्वत तक जा सके। गणेश जी ने उसे यह वरदान दे दिया।

इसके बाद बालक ने कैलाश पर्वत पर पहुंचकर भगवान शिव को पूरी कथा सुनाई। बालक की बात सुनकर भगवान शिव ने भी 21 दिन तक गणेश व्रत किया और माता पार्वती की नाराजगी दूर हो गई। बाद में माता पार्वती ने भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से इसी प्रकार का व्रत किया। व्रत के 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं माता से मिलने पहुंचे।

इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि विनायक चतुर्थी का व्रत सिर्फ पूजा का एक माध्यम नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने और अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर करने का साधन भी है। भगवान गणेश, जो विघ्नों का नाश करने वाले हैं, इस व्रत से प्रसन्न होकर अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इसलिए यह व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करना अत्यंत फलदायक माना गया है।

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डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।