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नवरात्र में वैष्णो देवी दरबार में लगती है भक्तों की भींड़, जानिए इस मंदिर का इतिहास

Vaishno Devi Temple: वैष्णो देवी के मंदिर के लिए मान्यता है कि माता वैष्णों अपने भक्त श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर समाज में उसकी लाज रखी और अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया।

Author नई दिल्ली | October 10, 2018 5:57 PM
वैष्णो देवी मंदिर शक्ति को समर्पित है।

वैष्णो देवी मंदिर में हमेशा भक्तों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन नवरात्र के मौके पर मंदिर में भक्तों की भींड़ का नजारा देखने लायक होता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से भक्त यहां पर मां के दर्शन के लिए आते हैं। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र में देवी मां के दर्शन करने से जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। और भक्त एक सुखमय जीवन आरंभ करते हैं। वैष्णो देवी को साक्षात दुर्गा बताया गया है। त्रिकूट पर्वत पर पिंडी के रूप में मां यहां विराजमान हैं। ऐसा कहा जाता है कि दुर्गा माता इस इस रूप का दर्शन करने वाला व्यक्ति बड़ा ही भाग्यशाली होता है। चलिए वैष्णो देवी मंदिर के इतिहास के बारे में विस्तार से जानते हैं।

वैष्णो देवी मंदिर शक्ति को समर्पित है। उत्तर भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर में त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार वैष्णो देवी, शक्ति के अवतार वैष्णवी को समर्पित है। वैष्णों देवी का मंदिर कटरा नगर के पास स्थित है। मंदिर करीब 5 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। माता का दर्शन करने जाने वाले भक्त 12 किलोमीटर की लंबी चढ़ाई करते हैं। हर वर्ष यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं। माना जाता है कि भारत के तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखे जाने वाला मंदिर है। इस मंदिर की देख-रेख वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड द्वारा की जाती है। इस मंदिर के लिए मान्यता है कि यहां माता के बुलावे के बिना कोई नहीं आ पाता है।

वैष्णो देवी के मंदिर के लिए मान्यता है कि माता वैष्णों अपने भक्त श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर समाज में उसकी लाज रखी और अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। एक बार श्रीधर ने भंडारा किया और ब्राह्मणों के साथ भैरवनाथ के शिष्यों को भी आमंत्रित किया। भैरवनाथ ने भण्डारे में मांस-मदिरा की मांग की, इस पर श्रीधर ने उन्हें मना कर दिया। मां वैष्णवी वहां कन्या का रूप लेकर आईं और भैरवनाथ को समझाने का प्रयत्न किया। भैरवनाथ उनकी बात नहीं समझा और उस कन्या को पकड़ने का प्रयत्न किया। कन्या रूपी माता त्रिकूट पर्वत की तरफ भागीं और एक गुफा में जाकर नौ माह के लिए छुप गईं।

माता की रक्षा के लिए हनुमान ने भैरवनाथ का ध्यान बटाने का काम किया। जिस गुफा में माता नौ माह तक छुंपी थी, उसे अर्धकुंवारी गुफा के नाम से जाना जाता है। माता ने नौ माह बाद उस गुफा से निकलकर भैरवनाथ का संहार किया। भैरवनाथ को उसकी गलती का पता लगा और उसने माता से क्षमा मांगी। माता ने उसे कहा कि जो भी भक्त मेरे दर्शन करने आएंगें, उनकी यात्रा तुम्हारे दर्शन किए बिना पूरी नहीं होगी। आज इस मंदिर का मुख्य आकर्षण गुफा में विराजमान तीन पिंडियां है। यहां हर साल लगभग 500 करोड़ रुपए का दान आता है।

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