Vaishakh Purnima 2026 Vrat Katha: हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है। ऐसे ही वैशाख मास का पूर्णिमा तिथि विशेष मानी जाती है। इस दिन गंगा या फिर अन्य पवित्र नदी में स्नान करने के साथ-साथ दान करना पुण्यकारी माना जाता है। इसके अलावा इस दिन श्री हरि विष्णु और मां लक्ष्मी के साथ चंद्र देव क पूजा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होने के साथ सुख-समृद्धि की प्राप्ति हो सकती है। इसके साथ ही कुंडली से चंद्र दोष हटने से लेकर मानसिक तनाव कम हो सकता है। वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन गौतम बुद्ध का जन्म होने के साथ उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस साल वैशाख पूर्णिमा 1 मई 2026, शुक्रवार को पड़ रही है। ऐसे में इस दिन विष्णु-लक्ष्मी जी की पूजा करने के साथ इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करें। जानें वैशाख पूर्णिमा की संपूर्ण व्रत कथा…
वैशाख पूर्णिमा 2026 व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, कांतिका नाम के एक समृद्ध नगर में चंद्रहास्य नामक राजा राज्य करता था। उसी नगर में धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ सुख-समृद्धि से रहता था। घर में धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण दोनों के जीवन में गहरा दुःख था।
एक दिन नगर में एक साधु आया, जो प्रतिदिन घर-घर जाकर भिक्षा मांगता और गंगा तट पर बैठकर भोजन करता था। आश्चर्य की बात यह थी कि वह साधु कभी भी धनेश्वर के घर भिक्षा लेने नहीं जाता था। यह देखकर धनेश्वर और सुशीला व्याकुल हो उठे। उन्होंने साधु से विनम्रता से कारण पूछा।
साधु ने उत्तर दिया कि तुम निःसंतान हो। ऐसे घर का अन्न लेना शास्त्रों में उचित नहीं माना जाता, इसलिए मैं तुम्हारे यहां भिक्षा नहीं लेता। यह सुनकर धनेश्वर का हृदय टूट गया। उसने साधु से प्रार्थना की हे महाराज, कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे हमें संतान सुख प्राप्त हो सके।
साधु ने उन्हें सोलह दिनों तक मां चंडी की उपासना करने का उपाय बताया। दोनों पति-पत्नी ने श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत और पूजा आरंभ कर दी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं मां काली प्रकट हुईं और सुशीला को पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। साथ ही उन्होंने एक विशेष व्रत का विधान बताया कि प्रत्येक पूर्णिमा को दीप जलाना और हर पूर्णिमा पर दीपकों की संख्या बढ़ाते जाना, जब तक कि वे 32 न हो जाएं।
मां के आदेश का पालन करते हुए सुशीला नियमित रूप से पूर्णिमा व्रत करने लगी। कुछ समय बाद उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने देवदास रखा।
समय बीतने पर देवदास बड़ा हुआ और उसे शिक्षा के लिए काशी भेजा गया। वहां उसके जीवन में एक विचित्र घटना घटी। अनजाने में उसका विवाह कर दिया गया। जब देवदास ने बताया कि उसकी आयु अल्प है, तब भी विवाह रोका नहीं गया।
कुछ समय बाद जब काल देवदास के प्राण लेने आया, तो वह असफल रहा। यह देखकर काल ने यमराज को सूचना दी। तब यमराज स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुचे और इस रहस्य को जानना चाहा। माता पार्वती ने बताया कि देवदास के माता-पिता ने पूर्णिमा व्रत का पालन किया था और मां काली से वरदान प्राप्त किया था, इसलिए उस पर काल का प्रभाव नहीं हो सकता।
तभी से यह मान्यता प्रचलित हो गई कि पूर्णिमा व्रत करने से व्यक्ति को अकाल मृत्यु से रक्षा मिलती है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।
