Vaikuntha Chaturdashi 2017 Puja Vidhi, Vrat Katha and Shubh Muhurat: Lord Vishnu And Shiva Worshiped Today Lighting lamps Is Mythological Ritual - बैकुण्ठ चतुर्दशी 2017: इस दिन किया जाता है भगवान विष्णु और शिव का पूजन, दीपदान की है परंपरा - Jansatta
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बैकुण्ठ चतुर्दशी 2017: इस दिन किया जाता है भगवान विष्णु और शिव का पूजन, दीपदान की है परंपरा

Vaikuntha Chaturdashi 2017 Puja Vidhi, Vrat Katha: जब आषाढ़ की एकादशी के दिन भगवान विष्णु निंद्रा में चले जाते हैं, तब भगवान शिव इन चार महीनों में संसार के सभी कार्य संभालते हैं।

Vaikuntha Chaturdashi 2017 Puja: जानिए क्या है बैकुण्ठ चतुर्दशी, क्यों किया जाता है इस दिन दीपदान।

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष चतुर्दशी के दिन को बैकुण्ठ चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और शिव की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत किया जाता है। इस दिन को बैकुण्ठ चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन को हरिहर का मिलन कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव का मिलन हुआ था। इस दिन मंदिरों में बड़ा आयोजन किया जाता है। इस पर्व को अधिकतर उज्जैन, वाराणसी और महाराष्ट्र में धूमधाम से मनाया जाता है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि भगवान विष्णु ही सभी मांगलिक कार्य करवाते हैं, लेकिन जब आषाढ़ की एकादशी के दिन भगवान विष्णु निंद्रा में चले जाते हैं। तब भगवान शिव इन चार महीनों में संसार के सभी कार्य संभालते हैं। कार्तिक माह की एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं तो भगवान शिव उन्हें सारे काम सौंप देते हैं। इसी दिन को बैकुण्ठ चतुर्दशी कहा जाता है। इस वर्ष बैकुण्ठ चतुर्दशी की तिथि 2 नवंबर 2017 के शाम 4 बजकर 11 मिनट से शुरु होकर 3 नवंबर की दोपहर के 1 बजकर 46 मिनट तक रहेगी।

इस दिन कई लोग व्रत करते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। मंदिर से यात्राएं निकाली जाती हैं। पवित्र नदी में स्नान किया जाता है। विष्णु भगवान निंद्रा से जागते हैं तो इस उत्सव में दीपदान किया जाता है। वाराणसी के विष्णु मंदिर को बैकुण्ठ धाम जैसा सजाया जाता है। नदी-तलाबों आदि सभी जगहों पर दीपदान किया जाता है। इस दिन के लिए मान्यता है कि एक बार भगवान विष्णु काशी में भगवान शिव को एक हजार स्वर्ण कमल के पुष्प चढ़ाने का संकल्प करते हैं। भगवान शिव विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए एक स्वर्ण पुष्प कम कर देते हैं।

पुष्प कम होने पर विष्णु जी अपने कमल नयन नामक और पुण्डरी काक्ष नाम को स्मरण करके अपनी एक आंख चढ़ाने का विचार कर लेते हैं। इसके बाद भगवान शिव उनके भक्ति भाव को देखकर उनको कहते हैं कि तुम्हारे स्वरुप वाली कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बैकुण्ठ चौदस के नाम से जाना जाएगा। भगवान शिव इसी दिन विष्णु जी को सुदर्शन चक्र प्रदान करते हैं और माना जाता है कि इस दिन स्वर्ग के सभी द्वार खुले रहते हैं।

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