Vaibhav Laxmi Vrat Katha In Hindi: शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी के अलावा वैभव लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को रखने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि, धन-वैभव की प्राप्ति होने के साथ दांपत्य जीवन में खुशियां बनी रहती हैं। इस व्रत का आरंभ संकल्प लेने के साथ शुरू होता है। जिसमें आप 11 या फिर 21 शुक्रवार तक व्रत रखती हैं। इसके बाद विधिवत तरीके से व्रत का पारण करने के साथ वैभव लक्ष्मी कथा की पुस्तकों का वितरण करते हैं। मान्यता है कि व्रत का उद्यापन करने के बाद ही इस पूजा का पूर्ण फल मिलता है। अगर आप भी वैभव लक्ष्मी का व्रत रख रही हैं, तो शुक्रवार के दिन विधिवत तरीके से वैभव लक्ष्मी और मां लक्ष्मी की विधिवत पूजा करने के साथ इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करें। आइए जानते हैं वैभव लक्ष्मी की संपूर्ण व्रत कथा…
अगर आप भी वैभव लक्ष्मी का व्रत रखने की सोच रही हैं, तो सात, ग्यारह या इक्कीस या फिर आप अपनी श्रद्धा के अनुसार जितने शुक्रवार रखना चाहती हैं। उतने का संकल्प लेने के साथ अपनी कामना कह दें। इसके बाद हर शुक्रवार को पूरे श्रद्धा के साथ व्रत रखने के साथ व्रत कथा कहें और पूरे शुक्रवार होने के बाद आखिरी शुक्रवार को इसका शास्त्रीय विधि के अनुसार उद्यापन करें।
आखिरी शुक्रवार के दिन मां को प्रसाद में खीर का भोग लगाएं। इसके साथ ही सात सुहागिन महिलाओं को कुमकुम का तिलक लगाकर मां वैभवलक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक की प्रति उपहार में दें।
वैभव लक्ष्मी व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, किसी शहर में अनेक लोग रहते थे। सभी अपने-अपने कामों में लगे रहते थे। किसी को किसी की परवाह नहीं थी। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए। शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं और लोग शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाहों में फंसने लगे थे। इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।
ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी। उनका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे। शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे।
देखते ही देखते समय बदल गया। शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह करोड़पति से बगले रोडपति बन गया यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी। शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया।
शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किंतु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी। वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक मां जी खड़ी थी। उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आंखों में से मानो अमृत बह रहा था। उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था। उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया। शीला उस मां जी को आदर के साथ घर में ले आई। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया।
मां जी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं। इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी। फिर मां जी बोलीं- ‘तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई.’
मां जी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। मां जी ने कहा- ‘बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छांव जैसे होते हैं। धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता।
मां जी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई।
कहानी सुनकर मां जी ने कहा- ‘कर्म की गति न्यारी होती है। हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं। इसलिए तू चिंता मत कर अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएंगे। तू तो मां लक्ष्मी जी की भक्त है। मां लक्ष्मी जी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मी जी का व्रत कर इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।
शीला के पूछने पर मां जी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। मां जी ने कहा- ‘बेटी! मां लक्ष्मी जी का व्रत बहुत सरल है। उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।
शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। शीला ने संकल्प करके आंखें खोली तो सामने कोई न था। वह विस्मित हो गई कि मां जी कहां गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात् लक्ष्मीजी ही थीं।
दूसरे दिन शुक्रवार था। सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मां जी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ। यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनंद हुआ। उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई।
शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया। इक्कीसवें शुक्रवार को मांजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- ‘हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना. सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे मां! आपकी महिमा अपार है.’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को प्रणाम किया।
व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई। ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं।
डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।
