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क्यों खास माना जाता है उत्पन्ना एकादशी व्रत, जानिए इस व्रत का महत्व और व्रत विधि

उत्पन्ना एकादशी व्रत को बहुत खास माना जाता है। कहते हैं कि इस तिथि पर ही भगवान विष्णु में से देवी एकादशी का प्राकट्य हुआ था। देवी एकादशी के इस तिथि पर उत्पन्न होने की वजह से इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है।

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एकादशी व्रत श्रीहरि को समर्पित होता हैं।

Utpanna Ekadashi Vrat: हिंदू पंचांग के मुताबिक उत्पन्ना एकादशी व्रत मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन किया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर की मानें तो इस साल उत्पन्ना एकादशी व्रत 10 और 11 दिसंबर को रखा जा रहा है। 10 दिसंबर को स्मार्त जबकि 11 दिसंबर को वैष्णव व्रत रखेंगें।

उत्पन्ना एकादशी व्रत का महत्व (Utpanna Ekadashi Vrat Ka Mahatva)
उत्पन्ना एकादशी व्रत को बहुत खास माना जाता है। कहते हैं कि इस तिथि पर ही भगवान विष्णु में से देवी एकादशी का प्राकट्य हुआ था। देवी एकादशी के इस तिथि पर उत्पन्न होने की वजह से इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। कहते हैं कि एकादशी व्रत रखने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।

बताया जाता है कि यह व्रत मृत्यु के बाद व्यक्ति की सद्गति करवा सकता है। एकादशी व्रत बहुत प्रभावशाली माना जाता है। भगवान विष्णु और उनके स्वरूपों में श्रद्धा रखने वाले लोग एकादशी व्रत रखते हैं। कहा जाता है कि श्रद्धा से एकादशी व्रत रखकर भगवान विष्णु से कुछ मांगों तो वह जरूर मिलता है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत विधि (Utpanna Ekadashi Vrat Vidhi)
एकादशी के दिन का व्रत दशमी तिथि से शुरू हो जाता है।
एकादशी से एक दिन पहले यानी दशमी की रात का भोजन नहीं करना चाहिए।
एकादशी व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान कर पवित्र हो जाएं। साफ कपड़े पहनें।
सुबह भगवान विष्णु और देवी एकादशी की आराधना करें।

विधि-विधान से उत्पन्ना एकादशी व्रत की पूजा करें।
पूजा करने के बाद व्रत का पूरा दिन सत्य, अहिंसा और सत्कर्मों में ही व्यतीत करें।
एकादशी व्रत की रखने वाले व्यक्ति को विशेष तौर पर जीव हत्या, झूठ, बुरे कर्म, हिंसात्मक गतिविधियां और बेईमानी करने से बचना चाहिए।
कहते हैं कि जो व्यक्ति एकादशी व्रत रखकर इन सब कार्यों में लगा रहता है उसे पाप भोगना पड़ता है।

एकादशी के दिन ज्यादा-से-ज्यादा मंत्र जाप, देवी एकादशी का ध्यान, भगवान विष्णु या उनके अवतारों का ध्यान और कीर्तन करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
सूर्यास्त होने के बाद एक बार फिर भगवान विष्णु की पूजा करें। उन्हें मौसमी फलों या मिठाई का भोग लगाएं।
फिर परिवार के सभी सदस्यों को एकादशी के भोग का प्रसाद दें। इसके बाद स्वयं भी फल का प्रसाद लें।

आप चाहें तो फलाहार या दूध आदि का सेवन कर सकते हैं।
अगर आपने निर्जला व्रत किया है तो फलाहार और दूध का सेवन ना करें।
इस व्रत को अगले दिन खोला जाता है यानी इसका पारण अगले दिन सूर्योदय होने पर किया जाता है।
एकादशी के अगले दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करें।

फिर थोड़ा अनाज दान कर पारण के निश्चित समय पर व्रत खोलें यानी कुछ खाएं।
ध्यान रखें कि सभी एकादशी व्रतों का पारण समय अलग होता है।
कहते हैं कि एकादशी व्रत को पारण समय में ही खोला जाता है वरना इस व्रत का फल नहीं मिलता है।

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