ताज़ा खबर
 

सच्चा गुरु और उनकी दीक्षा

जीवन में कुछ भी सीखना हो तो गुरु की आवश्यकता होती है।

सांकेतिक फोटो।

राधिका नागरथ

जीवन में कुछ भी सीखना हो तो गुरु की आवश्यकता होती है। फिर इस मनुष्य जीवन का क्या तात्पर्य है, हम कौन हैं , किसलिए आए हैं, यह सब बिना गुरु के कैसे जाना जा सकता है? अगर गुरु शब्द की व्याख्या करें तो ‘गु’ का मतलब है अंधेरा और ‘रु’ का अर्थ है दूर करना।

सच्चे गुरु को तो हम ढूंढने निकलें, तो ही वह मिलेगा ऐसा कोई जरूरी नहीं। बस मन में जिज्ञासा हो सत्य को पाने की और अपने मन मस्तिष्क रूपी बर्तन को खाली करने की, तो उसे भरने के लिए स्वयं गुरु प्रकट हो ही जाता है। दत्तात्रेय ने तो साधारण व्यक्तियों एवं प्रकृति में समाहित 24 गुरुओं से ज्ञान पाया, चाहे वह मांस का टुकड़ा मुंह में दबाए उड़ती हुई चील थी या एक बालिका के हाथ में पहनी चूड़ियां।

इस तरह गुरु को पाने के लिए जब हम तैयार हो जाते हैं, अहंकार शून्य हो जाते हैं और यह मानने लगते हैं कि हम कुछ नहीं जानते हैं तभी गुरु अपना ज्ञान हृदय से उड़ेलता है। वरना तो छोटी-मोटी विद्या पाकर, छोटे-मोटे गुर सीख कर हर कोई गुरु बना बैठा है आज के युग में। रामकृष्ण परमहंस देव कहा करते थे कि गुरु वही है जो शास्त्र सम्मत बात कहता है, जिसका स्वयं पर संयम है। वे बोलते थे साधु को दिन में देखना चाहिए और रात में भी। जो पूर्णत: संयमित अपने इंद्रियों का स्वामी है, वह ही सच्चा गुरु हो सकता है।

गुरु दीक्षा देते हैं जिससे जीवन को दिशा मिलती है और हम भवसागर को पार करने में सक्षम बन जाते हैं। ऐसा भी देखने में आया है कि आज के समय में जब किसी भी चीज या व्यक्ति या क्रिया की गुणवत्ता मापनी हो तो एक स्टैंडर्ड आॅपरेटिंग प्रोसीजर जिसमें हर बात परिभाषित होती है उसी को लोग मानते हैं। जैसे दिशानिर्देश किसी भी मशीन को चलाने के पहले उसको स्विच आॅन करना है फिर अगला कदम लेना है। परंतु गुरु दीक्षा में ऐसी कोई एसओपी नहीं बनाई जा सकती।

सच्चा गुरु तो परमात्मा का ही रूप है और वह सूक्ष्म रूप से मंत्र दीक्षा द्वारा शिष्य को संवार देता है। अगर हमारे पास गैस का चूल्हा या इंडक्शन हीटर हो, पानी भी हो, दाल भी हो, किंतु जब तक वह अग्नि प्रज्वलित नहीं की जाएगी, इंडक्शन हीटर द्वारा ऊर्जा नहीं दी जाएगी अब तक भोजन नहीं पकाया जा सकता और पेट की भूख नहीं मिट सकती। इसी प्रकार शास्त्र कहते हैं कि गुरु द्वारा हमें दीक्षित होना आवश्यक है। तभी अध्यात्मिक साधना परिपक्व होती है और एक तीव्र गति से लक्ष्य की ओर बढ़ती है। जब कोई व्यक्ति दीक्षा मंत्र से अपने जीवन में उतार लेता है और नियमित रूप से उसे जपता है तू कितना भी घना अंधकार हो, कितनी भी गहरी कालिमा छाई हो, कितने भी अवगुणों से भरा व्यक्ति हो, वह निर्मल हो ही जाता है। ऐसी होती है गुरु कृपा और गुरु के मंत्र की शक्ति।

वेदों में तो यह गुरु की महिमा का बखान किया गया है : गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरागुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नम:।
अर्थात गुरु ही साक्षात ब्रह्म है और उस गुरु को मैं नमन करता हूं। इसी तरह गुरु के बारे में महान संत कवि कबीर दास ने यहां तक कहा गया है-
‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दियो मिलाय।।’

बहुत बार यह प्रश्न मन में उठता है कि जब गुरु मिल जाए तो फिर साधना की क्या आवश्यकता है? घर में सारी खाद्य सामग्री हो फिर भी खाना तो बनाना ही पड़ेगा और जो जल्दी बनाएगा उसे जल्दी खाने को मिलेगा. कुछ लोग सुबह खाते हैं कुछ शाम को और कई लोग भूखे रह जाते हैं क्योंकि वे पकाना नहीं चाहते। इसलिए जो जितनी जल्दी साधना शुरू करेगा, इतनी जल्दी प्रभु को पा लेगा। अहंकार शून्य हुए बिना कुछ ना होगा। ‘मैं निंवी, मेरे सतगुरु ऊंचे, उचेया नाल मैं लाई’। इस भजन की उक्ति में भक्त भगवान से कहता है कि मैं तो नीच था, मेरे में तो अवगुण भरे थे पर मुझे सतगुरु मिले जो परब्रह्म स्वरूप है। गुरु का मैं बलिहारी हूं जिन्होंने मुझ जैसे अधम का साथ निभाया।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा जो गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है उस दिन हमें यही प्रयत्न करना चाहिए कि कि हम अहंकार शून्य होकर मन से प्रार्थना करें कि हमें गुरु की कृपा मिलें। हम गुरु वाक्य पर चलें और आत्म साक्षात्कार के लिए सदा प्रयत्नशील रहें।

Next Stories
1 सनातन परंपरा है चातुर्मास
2 चाणक्य नीति से जानिए कौन से 4 भेद किसी को नहीं बताना चाहिए
3 सामुद्रिक शास्त्र: स्त्री-पुरुष के चेहरे के कौन से तिल माने जाते हैं लकी, जानिए
ये पढ़ा क्या?
X