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माता मुंडेश्वरी के इस मंदिर में दी जाती है रक्तहीन बलि, जानिए कैसे

बता दें कि माता मुंडेश्वरी का यह मंदिर भारत के संरक्षित स्मारकों में से एक है। साल 1915 में इसे यह दर्जा हासिल हुआ था।

Author नई दिल्ली | June 18, 2018 7:41 PM
माता मुंडेश्वरी की खास बात यह है कि इसे देश के 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है।

बिहार के कैमूर में माता मुंडेश्वरी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। इस मंदिर में माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु काफी दूर-दूर से आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि माता मुंडेश्वरी की श्रद्धाभाव के साथ पूजा-अर्चना करने पर भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। माता मुंडेश्वरी मंदिर की खास बात यह है कि इसे देश के 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है। ऐसे में इस मंदिर की महत्ता और भी अधिक हो जाती है। बता दें कि मुंडेश्वरी मां का यह मंदिर पवरा पहाड़ी पर स्थित है। ऐसा बताया जाता है कि इस मंदिर में आदिकाल से ही पूजा-अर्चना होती आ रही है। इसके साथ ही इसे दुनिया के सबसे प्राचीन कार्यात्मक मंदिरों में भी शुमार किया जाता है।

माता मुंडेश्वरी मंदिर की सबसे खास बात है, यहां पर दी जाने वाली रक्तहीन बलि। ऐसा बताया जाता है कि जब किसी श्रद्धालु की मनोकामना पूरी हो जाती है तो वह इस मंदिर में रक्तहीन बलि के लिए आता है। श्रद्धालु के द्वारा एक बकरा बलि के लिए मंदिर में लाया जाता है। मंदिर का पुजारी इस बकरे को मुंडेश्वरी माता के चरणों के पास रख देता है। कहते हैं कि पुजारी जैसे ही बकरे पर अक्षत फेंकता है, बकरा मूर्छित हो जाता है। इसके कुछ समय बाद दोबारा पुजारी के द्वारा बकरे पर अक्षत फेंकी जाती है। इससे वह पुन: उठ खड़ा होता है। इस प्रकार से मंदिर की रक्तहीन बलि प्रथा पूरी होती है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, इस मंदिर का निर्माण 108 ई. में हुआ था। बता दें कि अब यह मंदिर भारत के संरक्षित स्मारकों में से एक है। साल 1915 में इसे यह दर्जा हासिल हुआ था। एक अन्य किस्से के मुताबिक औरंगजेब के शासनकाल में इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश की गई थी। हालांकि वे लोग इस कार्य में सफल नहीं हुए। बताते हैं कि जो मजदूर इस मंदिर को तोड़ रहे थे,अचानक से उन्हें कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा। इससे वे सभी मंदिर को तोड़ने के काम से पीछे हट गए और माता मंडेश्वरी का मंदिर नहीं तोड़ा जा सका।

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