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जुलाई में शनिदेव के गोचर करते ही इन 2 राशि वालों को मिलेगी ढैय्या से मुक्ति, खुलेंगे तरक्की के नए मार्ग

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि ग्रह 12 जुलाई को मकर राशि में वक्री होने जा रहे हैं। शनि देव के वक्री होते ही दो राशियों पर से शनि की ढैय्या का प्रकोप खत्म हो जाएगा। आइए जानते हैं ये किन राशि के लोग हैं।

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Shani Vakri In July: जुलाई में शनि देव होने जा रहे हैं वक्री- (जनसत्ता)

वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब भी कोई ग्रह राशि परिवर्तन करता है या किसी अन्य ग्रह के साथ युति बनाता है। तो उसका सीधा असर मानव जीवन ओर पृथ्वी पर पड़ता है। आपको बता दें कि आयु प्रदाता शनि देव ने 29 अप्रैल को कुंभ राशि में गोचर किया है। शनि के गोचर करते ही कुछ राशियों पर ढैय्या का प्रभाव शुरू होता है तो किसी राशि पर ढैय्या का प्रकोप खत्म होता है। आपको बता दें शनि देव के जुलाई में वक्री होते ही इन राशियों को ढैय्या से मुक्ति मिल जाएगी। आइए जानते हैं इन राशियों के बारे में…

जुलाई में इन राशियों को मिलेगी ढैय्या से मुक्ति:
वैदिक ज्योतिष के अनुसार 29 अप्रैल को शनि देव ने अपनी स्वराशि कुंभ में प्रवेश कर लिया है। शनि ग्रह के इस राशि में प्रवेश करते ही मिथुन और तुला वालों को शनि ढैय्या से मुक्ति मिल गई है। वहीं कर्क और वृश्चिक राशि वाले इसकी चपेट में आ गए हैं। लेकिन जुलाई में वक्री होते ही इन राशियों को शनि की ढैय्या से मुक्ति मिल जाएगी। क्योंकि शनि देव अपनी पिछली राशि मकर में प्रवेश करेंगे। जिससे कर्क और वृश्चिक राशि के जातकों को शनि की ढैय्या से मुक्ति मिल जाएगी। जिससे कर्क और वृश्चिक राशि के लोगों को काम बनना शुरू होंगे। कारोबार में अच्छा मुनाफा देखने को मिलेगा। साथ ही हर काम में सफलता के योग हैं।

ढाई साल की होती है ढैय्या:

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि ढैय्या की अवधि ढाई साल की होती है। जिसमें शनि शारीरिक और मानसिक कष्ट देते हैं हा अगर व्यक्ति के कर्म सही हैं, तो फिर शनिदेव शुभ फल प्रदान करते हैं। क्योंकि शनि ही एक ऐसे ग्रह हैं जो व्यक्ति को कर्मों के हिसाब से फल देते हैं। वहीं यहांं देखने वाली बात यह भी है कि शनि कुंडली में किस राशि और किस स्थान में स्थित हैं। उनकी किसी शत्रु ग्रह के साथ युति तो नहीं है।

वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह का महत्व:
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि ग्रह तुला राशि में उच्च के माने जाते हैं तो मेष इनकी नीच राशि कहलाती है। 27 नक्षत्रों में इन्हें पुष्य, अनुराधा, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्त होता है। मतलब ये इन राशियों के आधिपत्य कहलाते हैं। साथ ही बुध और शुक्र के साथ इनका मित्रता का भाव है और सूर्य, चंद्रमा और मंगल शत्रु ग्रह माने जाते हैं। शनि के गोचर काल की अवधि करीब 30 महीने की होती है। साथ ही शनि की महादशा ज्योतिष के अनुसार 19 साल की मानी जाती है। अगर कुंडली में शनि मजबूत स्थिति में हैं, तो व्यक्ति जीवन में सेहत को लेकर कभी परेशान नहीं रहता। साथ ही उसके सारे काम आसानी से बनते चले जाते हैं और वह स्वास्थ्य को लेकर कभी परेशान नहीं रहता।

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