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यहां नहीं होती है प्रभु राम की पूजा, जानिए इस मंदिर का रहस्य

राजा रामचंद्र मंदिर पूरी दुनिया का एकमात्र मंदिर है जहां भगवान राम को राज के रूप में पूजा जाता है। साथ ही किसी राजा जैसा दिन में पांच बार पुलिस के जावन सलामी भी देते हैं।

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देश में राजा रामचंद्र का एक ऐसा मंदिर है जहां श्रीराम की पूजा भगवान के तौर पर नहीं बल्कि राजा के रूप में की जाती है। यह मंदिर मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित है। कहते हैं कि यहां राज राम को सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद सलामी दी जाती है। इस सलामी के लिए मध्यप्रदेश पुलिस के जवान तैनात रहते हैं। राजा रामचंद्र को ओरछा नगर के राज के रूप में स्वीकारा गया है और रोजाना पंचो प्रहर उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। परंतु क्या आप जानते हैं कि आखिर ये ऐसा क्यों है? साथ ही इसकी क्या धार्मिक मान्यता है? यदि नहीं तो आगे हम इसे जानते हैं।

राजा रामचंद्र मंदिर पूरी दुनिया का एकमात्र मंदिर है जहां भगवान राम को राज के रूप में पूजा जाता है। साथ ही किसी राजा जैसा दिन में पांच बार पुलिस के जावन सलामी भी देते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में राजा राम के साथ सीता, लक्ष्मण जी, सुग्रीव महाराज नरसिंह जी, हनुमान जी, जामवंत जी, मां दुर्गा भी राम दरबार में उपस्थित हैं। इस मंदिर के बनने और श्रीराम को राजा के स्वरूप में पूजनीय होने के पीछे भी एक कहनी छिपी हुई है। कहते हैं कि संवत 1600 में तत्कालीन बुंदेला शासक मधुकर शाह की पत्नी महारानी कुंवारी, गणेश स्वयं राजा राम की मूर्ति को अयोध्या से ओरछा लेकर आए थे।

एक दिन राज ने अपनी रानी को कृष्ण उपासना के लिए वृन्दावन चलने को कहा। लेकिन रानी उन्हे छोड़कर नहीं जाना चाहती थी। राज ने क्रोध में आकार कहा अगर तुम श्रीराम की भक्त हो तो तुम उन्हें ओरछा लेकर आओ। रानी ने अयोध्या में रहते हुए सरयू नदी के किनारे अपने लिए एक कुटिया बनाई और उसी में रहकर श्रीराम की साधना आरंभ की। उस समय संत शिरोमणि तुलसीदास भी साधना में लीन थे। उनहोंने रानी को आशीर्वाद दिया परंतु इसके बाद भी लंबे अरसे तक ताप के बाद भी रानी राम के दर्शन नहीं हुए। वह निरास होकर सरयू नदी में ही प्राण त्यागने के उदेश्य से बहते जल में कूद गई।

उस जल की गहराई के भीतर ही रानी को भगवान राम के दर्शन हो गए। साथ ही उसी समय रानी ने श्रीराम को अपने साथ अयोध्या चलने को कहा। कहते हैं कि उस समय भगवान राम ने एक शर्त रखी थी कि वे तभी ओरछा जाएंगे जब उस राज्य में उन्हीं की सत्ता कायम हो। रानी ने श्रीराम की ये शर्त मान ली और उन्हें अपने साथ ओरछा लेकर आ गईं। तब से लेकर आज तक सिपाही से लेकर आम जनता तक श्रीराम को भगवान राम नहीं बल्कि राजा राम की तरह सम्मान देते आ रहे हैं।

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