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झांसी की रानी ने इस जगह ली थी अंतिम सांस, यहीं हुआ था अंतिम संस्कार

झांसी की रानी ने अपनी अंतिम लड़ाई 18 जून 1858 को ग्वालियर में फूलबाग नामक स्थान पर लड़ी। इसी स्थान पर आज उनका स्मारक भी है और उनके नाम से लक्ष्मीबाई कॉलोनी भी।

झांसी की रानी ने इस जगह ली थी अंतिम सांस, यहीं हुआ था अंतिम संस्कार
ग्वालियर स्थित निर्मोही अखाड़ा

डॉ राज सिंह

सर्वोच्च न्यायालय में राम जन्मभूमि विवाद के कारण निर्मोही अखाड़ा सुर्खियों में रहा है। यदा-कदा, कुंभ मेले के अवसर को छोड़कर, अखाड़ों का जिक्र मीडिया में नहीं होता। जनसाधारण अखाड़ों को कुश्ती से संबंधित स्थान मानते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि अखाड़े, सनातन धर्म की सशस्त्र सेना रहे हैं और इनका अस्तित्व लगभग 900 वर्ष पुराना है। दुनिया के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों ने अखाड़ों के इतिहास पर अनेक शोध किए हैं। जिनमें इंग्लैंड, अमेरिका और इजराइल के विश्वविद्यालय भी सम्मिलित हैं।

भारतीय इतिहास के कई प्रतिष्ठित योद्धाओं का निर्मोही अखाड़े से घनिष्ठ संबंध रहा है। जिनमें धर्मयोद्धा वीर बंदा बैरागी, शिवाजी एवं झांसी की रानी भी सम्मिलित हैं। इतिहासकार विलियम आर पिंच ने उल्लेख किया है कि शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास के शिष्य वैष्णव दास ने औरंगजेब के काल में अयोध्या में हनुमानगढ़ी की रक्षा की थी। धर्मयोद्धा वीर बंदा बैरागी का प्रथम सैनिक मुख्यालय भी दिल्ली के पश्चिम में 20 मील दूर सेहरी खांडा गांव में निर्मोही अखाड़ा मठ ही था।

झांसी की रानी ने तो अपनी अंतिम सांस भी ग्वालियर स्थित निर्मोही अखाड़े के स्थान, गंगा दास के मठ में ली थी और यहीं पर उनका अंतिम संस्कार हुआ। झांसी की रानी ने अपनी अंतिम लड़ाई 18 जून 1858 को ग्वालियर में फूलबाग नामक स्थान पर लड़ी। इसी स्थान पर आज उनका स्मारक भी है और उनके नाम से लक्ष्मीबाई कॉलोनी भी। इसी लक्ष्मीबाई कॉलोनी में स्थित है, महंत गंगा दास जी की बड़ी शाला ,जो निर्मोही अखाड़े का मठ है और वैष्णव परंपरा की 52 पीठों में से एक है, जो रामानंदी संप्रदाय का द्वारा है।

वैसे तो इस पीठ की स्थापना अकबर के काल में हुई, लेकिन वर्ष 1858 में इस पीठ के द्वाराधीश महंत गंगा दास जी थे। अंग्रेजों से लड़ाई के कुछ दिन पूर्व झांसी की रानी द्वारा महंत गंगा दास जी के साथ दार्शनिक वार्तालाप का भी उल्लेख इतिहास में मिलता है। ग्वालियर में 18 जून 1858 को, जब रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सेना से लड़ते लड़ते बुरी तरह घायल हो गईं तो उनके सैनिक उन्हें घायल अवस्था में उठाकर महंत गंगा दास जी की कुटिया में लेकर गए।

धार्मिक गुरु ने उनका सिर अपनी गोदी में रखकर गंगाजल पिलाया। रानी को जब आभास हो गया कि उनका अंतिम क्षण अब बहुत निकट है तो उन्होंने महंत गंगा दास जी से निवेदन किया कि ये अंग्रेज मेरे मृत शरीर को भी हाथ ना लगा पाएं। सैकड़ों हथियारबंद बैरागी साधुओं ने रानी के लिए सुरक्षा कवच बना लिया और दोनों तरफ से घंटों गोलियां चलती रही। जब रानी ने प्राण त्याग दिए तो बाबा गंगादास जी की कुटिया तोड़कर शीघ्रता शीघ्र चिता बनाई गई और बाबा जी ने वैदिक रीति से उनका अंतिम संस्कार कर दिया। इतिहास में उल्लेख है कि मठ के अंदर से दो बंदूकों से तो गोलियां तब तक आती रही जब तक चिता जलकर पूरी तरह शांत नहीं हो गई। इस युद्ध में 745 बैरागी साधुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी।

अंग्रेजी सेना के कमांडर जब चिता तक पहुंचे तो उनके हाथ कुछ भी नहीं लगा। यह भी अभी तक एक रहस्य बना हुआ है की झांसी की रानी का खजाना आखिर कहां गया। कालपी से ग्वालियर आने के 15 दिन बाद ही रानी शहीद हो गई थीं। चली आ रही जनश्रुतिओं के अनुसार, रानी ने खजाने का पता अपने सबसे निकट बाबा गंगादास को बता दिया था। बाबा गंगादास ने अपने खास शिष्य कुतवार मंदिर के महंत बाबा कालूराम को भी बता दिया था। रानी के शहीद होने के बाद बाबा गंगादास ने, रानी के दत्तक पुत्र दामोदर को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया था। रानी लक्ष्मीबाई का साथ देने की वजह से बाबा गंगादास, ग्वालियर छोड़कर हरिद्वार चले गए थे ।

अनुमान के आधार पर कुछ खजाना कालपी में ही रह गया था। जबकि ग्वालियर लाया गया खजाना बाबा गंगादास के मठ और लधेड़ी नामक स्थान में छुपाया गया था। बाबा गंगादास, बाद में जीवाजी राव सिंधिया के आग्रह पर वापस ग्वालियर तो आ गए थे लेकिन इस दौरान खजाने की खुदाई का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इस स्थान पर आज भी यह मठ अच्छी स्थिति में है और वहां मंदिर एवं समाधियां बनाई गई हैं। इस मठ में, युद्ध में प्रयुक्त ,साधुओं के चिमटे, भाले, नेजे ,बंदूक और एक छोटी सी तोप आज भी सुरक्षित है। मठ के साधु और उनके अनुयाई झांसी की रानी के बलिदान दिवस पर हर वर्ष समारोह करके उनको याद करते हैं।

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