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रविवार के दिन सूर्य कल्प विधान का पाठ करने से बन सकते हैं यश, सुख-समृद्धि और पुत्र-पौत्र मिलने के योग

ज्योतिष शास्त्र में ऐसी मान्यता है कि रविवार के दिन उगते सूर्य के सामने पीले रंग का आसन बिछाकर सूर्य कल्प विधान का पाठ करने से आयुष्य, आरोग्य, कीर्ति, धन, पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति होती है।

surya upasana, surya kalap vidhan, surya stotraरविवार के दिन सूर्य देव की उपासना करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

Surya Upasana on Ravivaar : रविवार के दिन सूर्य नारायण भगवान की पूजा जरूर करनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि रविवार के दिन सूर्य देव की उपासना करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। ज्योतिष शास्त्र में ऐसी मान्यता है कि रविवार के दिन उगते सूर्य के सामने पीले रंग का आसन बिछाकर सूर्य कल्प विधान का पाठ करने से आयुष्य, आरोग्य, कीर्ति, धन, पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति होती है।

सूर्य कल्प विधान (Surya Kalap Vidhan)
आचम्य प्राणानायम्य। संकल्प:।
ममात्मन: श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थ श्री सवितृ सूर्यनारायण प्रीत्यर्थ च तृचाकल्पविधिना नमस्कसख्सं कर्म करिष्ये।

ॐ ह्रां उद्यन्नद्य मित्रमह: ह्रां ॐ मित्राय नम:।
ॐ ह्रीं आरोहन्नुत्तरां दिवं र्ह्र ॐ रवये नम:।
ॐ ह्रूं हृदरोगं मम सूर्यं ह्रूं ॐ सूर्याय नम:।
ॐ ह्रैं हरिमाणं च नाशय ह्रैं भानवे नम:।

ॐ ह्रौं शुकेषु मे हरिमाणं ह्रौं ॐ खगाय नम:।
ॐ रोपणाकासु ध्दमसि ह्र: ॐ पूष्णे नम:।
ॐ अथो हारिद्रवेषु मे ह्रां ॐ हिरण्यगर्भाय नम:।
ॐ हरिमाणं निध्दमसि ह्रीं ॐ मरीचये नम:।

ॐ उदगादमादित्य: ह्रूं आदित्याय नम:।
ॐ विश्बेन सहसा सह ह्रैं ॐ सवित्रे नम:।
ॐ ह्रौं द्विषन्तं मह्रां रंधयन् ह्रौं ॐ अकार्य नम:।
ॐ ह्र: मो अहं द्विवषते रधम् ह्र: ॐ भास्कराय नम:।

ॐ ह्रां ह्रीं उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं ह्रां ह्रीं ॐ मित्ररविभ्यां नम:।
ॐ ह्रूं ह्रैं हृद्रोगे मम सूर्य हरिताणं च नाशय ह्रूं ह्रैं ॐ सूर्यभानुभ्यां नम:।
ॐ ह्रां ह्रीं अथो हारिद्रवेषु मे हरिताणं निध्दमसि ह्रां ह्रीं ॐ रिहण्यगर्भमरीचिभ्यां नम:।
ॐ ह्रूं ह्रैं उद्गादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह ह्रूं ह्रैं ॐ आदित्य सवितृभ्यां नम:।

ॐ ह्रौं ह्र: द्विषन्तं मह्रां रंधयन् मो अह्रं द्विषते रथं ह्रौं ह्र: ॐ अर्कभास्कराभ्यां नम:।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ॐ मित्ररविसूर्यभानुभ्यो नम:।
ॐ ह्रौं ह्रं: ह्रां ह्रीं शुकेषु हरिमाणं रोपणाकासु ध्दसि अथो हारिद्रवेषु में हरिमाणं निध्दमसि ह्रीं ह्र: ह्रां ह्रीं खगपूषहिरण्यगर्भमरीचिभ्यो नम:।
ॐ ह्रूं ह्रौं ह्र: उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह द्विषन्तं मह्रां रंधयन् मो अहं द्विषते रथं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्र: ॐ आदित्यसवित्रर्क भास्करेभ्यो नम:।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्र: ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्र: उद्यन्नद्य: मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय। शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु ध्दमसि अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं निध्दमसि। उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह द्विषन्तं मह्रां रंधयन् मो अहं द्विषते रधम्। ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्र: ॐ मित्ररविसूर्यभानुखगपूषहिरण्यगर्भमरीच्यादित्य सवित्रर्क भास्करेभ्यो नम:।

ॐ श्री सवित्रे सूर्यनारायणाय नम:।
आदित्यस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिनेदिने।
नमो धर्मविधानाय नमस्ते कृतसाक्षिणे।
नम: प्रत्यक्षदेवाय भास्कराय नमो नम:।।

अनेन तृचाकल्पनमस्कराराख्येन कर्मणा भगवान् श्रीसवितृसूर्यनारायण: प्रीयताम्।
न मम।
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधि निवाशनम्।
सूर्यपादोदकं तीर्थं जठरे धारयाम्यह्म।।

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