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सूर्य सप्तमी व्रत: सूर्यदेव की उपासना से मिलता है निरोगी काया का वरदान, जानिए व्रत-कथा और विधि

शाम्ब अपने पिता की आज्ञा मानकर सूर्य भगवान की आराधना शुरु कर दी। कुछ समय बीतने के बाद शाम्ब कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए।

Author नई दिल्ली | February 12, 2019 9:18 AM
सूर्यदेव।

सूर्य सप्तमी प्रत्येक साल माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। इसे अचला सप्तमी, रथ सप्तमी और आरोग्य सप्तमी के अन्य नामों से भी जाना जाता है। साल 2019 में सूर्य सप्तमी 12 फरवरी, मंगलवार को मनाया जा रहा है। भगवान सूर्य को समर्पित सूर्य सप्तमी का वर्णन पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो मनुष्य सूर्यदेव की उपासना करता है वह हमेशा निरोगी रहता है। आगे जानते हैं शास्त्रों के अनुसार सूर्य सप्तमी की कथा और व्रत-विधि क्या है।

व्रत कथा: भविष्य पुराण में सूर्य सप्तमी के संदर्भ में एक कथा आई है। इस कथा के अनुसार श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब को अपने शारीरिक बल पर बहुत अधिक गुमान था। एक बार दुर्वासा ऋषि श्रीकृष्ण से मिलने के लिए आए। वे अत्यधिक क्रोधी स्वभाव के थे। उनके क्रोध से सभी परिचित थे लेकिन शाम्ब को उनके क्रोध का ज्ञान नहीं था। दुर्वासा ऋषि बहुत तप करते थे। जब वह श्रीकृष्ण से मिलने आए तब भी बहुत लंबे समय का तप कर के आए थे। तपस्या से उनका शरीर बहुत कमजोर हो गया था।

श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब ने जब दुर्वासा ऋषि के कमजोर शरीर को देखा तो वह जोर से हंसने लगे। दुर्वासा ऋषि को शाम्ब के हंसने का जब कारण पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और शाम्ब की धृष्ठता को देखकर उन्होंने उसे कुष्ठ रोग होने का श्राप दे दिया। ऋषि के श्राप देते ही शाम्ब के शरीर पर तुरंत असर होना शुरु हो गया। डॉक्टरों ने शाम्ब की हर तरह से इलाज किया लेकिन इससे कुछ भी लाभ नहीं हुआ। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र शाम्ब को सूर्य भगवान की उपासना करने के लिए कहा। शाम्ब अपने पिता की आज्ञा मानकर सूर्य भगवान की आराधना शुरु कर दी। कुछ समय बीतने के बाद शाम्ब कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए।

विधि: सूर्य सप्तमी के दिन सुबह जल्दी उठें। स्नान आदि से निवृत होकर किसी जलाशय, नदी, नहर में सूर्योदय से पहले स्रान करना चाहिए। मान्यता है कि सिर पर बदर वृक्ष और अर्क पौधे की सात-सात पत्तियां रखकर स्रान करने से शुभ परिणाम मिलता है। स्रान के बाद उगते हुए सूर्य की आराधना करनी चाहिए। जलाशय, नदी या नहर के समीप खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद शुद्घ घी से दीपक जलाना चाहिए। कपूर, धूप, लाल फूल आदि से भगवान सूर्य का पूजन करना चाहिए। उसके बाद दिन भर भगवान सूर्य का स्मरण करना चाहिए। इस दिन अपाहिजों, गरीबों और ब्राह्मणों को अपनी क्षमता के अनुसार दान देने का विधान है। दान के रूप में वस्त्र, भोजन और दूसरी उपयोगी वस्तुएं जरूरतमंद व्यक्तियों को दे सकते हैं। स्रान करने के बाद सात प्रकार के फलों, चावल, तिल, दूर्वा, चंदन आदि को जल में मिलाकर उगते हुए भगवान सूर्य को जल देना चाहिए। सूर्य को भक्ति और विश्वास के साथ प्रणाम करना चाहिए। उसके पश्चात सूर्य मंत्र “ॐ सूर्याय नमः” का जाप 108 बार करना चाहिए।

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