ज्योतिष आकलन, 21 जून को लगने वाला सूर्य ग्रहण होगा बेहद संवेदनशील

ग्रहों के वक्री होने से प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। जैसे अत्याधिक वर्षा, समुद्री चक्रवात, तूफान, महामारी आदि। शनि, मंगल और गुरु के प्रभाव से विश्व में आर्थिक मंदी का असर एक वर्ष तक बना रहेगा।

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सूर्य ग्रहण 2020: भारत समेत इस ग्रहण को दक्षिण-पूर्व यूरोप, हिन्द महासागर, प्रशांत महासागर, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका में देखा जा सकेगा।

Solar Eclipse/Surya Grahan 2020: 21 जून को सूर्य ग्रहण लगेगा जो वलयाकार होगा। यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा। जिस कारण इसका सूतक काल मान्य होगा। इस ग्रहण की शुरुआत सुबह 9 बजकर 15 मिनट से हो जायेगी जिसका अंत दोपहर 02 बजकर 2 मिनट पर होगा। ग्रहण लगने से ठीक 12 घंटे पहले सूतक शुरू हो जायेगा।

भारत समेत इस ग्रहण को दक्षिण-पूर्व यूरोप, हिन्द महासागर, प्रशांत महासागर, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका में देखा जा सकेगा। ज्योतिष अनुसार ये ग्रहण आषाढ़ कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मिथुन राशि और मृगशिरा नक्षत्र में लगेगा। इसलिए मिथुन वालों पर इस ग्रहण का सबसे ज्यादा प्रभाव देखने को मिलेगा। इस ग्रहण के समय कुल 6 ग्रह वक्री होंगे जो अच्छा संकेत नहीं है। कहा जा रहा है ये ग्रहण पूरे विश्व के लिए चिंताजनक रहने वाला है।

21 जून को लगने जा रहे सूर्य ग्रहण के समय मंगल जलीय राशि मीन में स्थित होकर सूर्य, बुध, चंद्रमा और राहु को देखेंगे जिससे अशुभ स्थिति का निर्माण होगा। इसके अलावा शनि, गुरु, शुक्र, बुध, राहु, केतु वक्री अवस्था में होंगे। इसे भी अशुभ माना जा रहा है। ग्रहण के समय इन बड़े ग्रहों के वक्री होने से प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। जैसे अत्याधिक वर्षा, समुद्री चक्रवात, तूफान, महामारी आदि। शनि, मंगल और गुरु के प्रभाव से विश्व में आर्थिक मंदी का असर एक वर्ष तक बना रहेगा।

कैसे लगता है सूर्य ग्रहण? ग्रहण लगने के वैज्ञानिक के साथ धार्मिक कारण भी माने जाते हैं। विज्ञान अनुसार सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है। जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य में आ जाता है तब सूर्य की किरणें पृथ्वी तक नहीं पहुँच पातीं इस घटना को ही सूर्य ग्रहण कहा जाता है। तो वहीं धार्मिक दृष्टि से देखा जाये तो ग्रहण पापी ग्रहों राहु और केतु के कारण लगता है। एक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान विष्णु देवताओं को अमृत पिलाने के उदेश्य से मोहिनी रूप लेते हैं तब सभी देवता और दानव उनकी बात मानकर एक लाइन में बैठ जाते हैं। विष्णु जी देवताओं को अमृत पिलाना शुरू करते हैं तभी एक राक्षस तो भगवान विष्णु पर शक होता है जिस कारण वह दानव देवताओं के बीच में आकर बैठ जाता है। इस बात की जानकारी सूर्य और चंद्र देव भगवान विष्णु को देते हैं। तभी भगवान विष्ण अपने सुदर्शन चक्र से उस राक्षक का सिर धड़ अलग कर देते हैं। लेकिन उस राक्षस के मुंह में अमृत की कुछ बूंदे चली गईं थीं। जिस कारण वह अमर हो गया। उसका एक हिस्सा राहु तो दूसरा हिस्सा केतु कहलाया। तभी से राहु केतु सूर्य और चंद्र को अपना दुश्मन मानते हैं और अमावस्या के दिन वह सूर्य का तो पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का ग्रास कर लेते हैं। लेकिन ये जरूरी नहीं कि हर अमावस्या या पूर्णिमा को ऐसा हो।

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