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Surya Grahan 2018: जानिए ग्रहण के समय क्यों किया जाता है डाभ यानी कुशा का इस्तेमाल

Surya Grahan 2018, Solar Eclipse 2018 Date and Time Timings Today India: डाभ को शास्त्रों में कुशा नाम दिया गया है। मान्यता है कि जब इन खाद्य और पेय पदार्थों को कुशा पर रख दिया जाता है तो उनका दूषित तत्व समाप्त हो जाता है।

Author नई दिल्ली | July 12, 2018 7:30 PM
सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण से एक घंटे पहले कुशा को खान-पान की वस्तुओं के ऊपर रख देने की बात कही गई है। (सांकेतिक तस्वीर)

Surya Grahan 2018 Timings, Solar Eclipse 2018 Date and Time: हमारे देश में ग्रहण को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक है ग्रहण के दौरान डाभ(कुशा) का प्रयोग। ज्योतिष शास्त्र की मानें तो राहु-केतु के सूर्य या चंद्रमा पर हावी होने की कोशिश के दौरान ग्रहण लगता है। राहु को तम के नाम से भी जाना जाता है और तम का मतलब अंधकार होता है। कहते हैं कि तमोगुण द्वारा सात्विक प्रकाश को दबाने से उसकी शक्ति अशुद्ध हो जाती है। बताते हैं कि इस अशुद्धता का सबसे ज्यादा प्रभाव खान-पान की वस्तुओं पर पड़ता है। ऐसे में ग्रहण के दौरान भोजन करने से मानव शरीर में तमोगुण के बढ़ जाने की मान्यता है। कहा जाता है कि शरीर में तमोगुण बढ़ जाने से व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से काफी निर्बल हो जाता है।

बता दें कि डाभ को शास्त्रों में कुशा नाम दिया गया है। मान्यता है कि जब इन खाद्य और पेय पदार्थों को कुशा पर रख दिया जाता है तो उनका दूषित तत्व समाप्त हो जाता है। माना जाता है कि कुशा तमोगुण के लिए कुचालक का काम करती है। ऐसे में सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण से एक घंटे पहले कुशा को खान-पान की वस्तुओं के ऊपर रख देने की बात कही गई है। कहते हैं कि ग्रहण के दौरान बर्तनों को भी डाभ(कुशा) से ढ़क देना चाहिए। ऐसा करने से खाद्य और पेय पदार्थों समेत बर्तनों की भी शुद्धता बरकरार रहने की मान्यता है।

डाभ यानी कि कुशा को लेकर एक बड़ी ही रोचक कथा प्रचलित है। इसके मुताबिक हिरण्याक्ष के द्वारा पृथ्वी को पाताल में जाने पर विष्णु जी ने वाराह का अवतार लिया था। विष्णु जी ने समुद्र रास्ते से होकर पाताल में प्रवेश किया। इस दौरान उनके शरीर पर कुछ कीचड़ चिपक गया था। इस विष्णु ने जब अपने शरीर को झाडा तो कुछ केश टूटकर समुद्र में गिर गए। बताते हैं कि ये केश ही डाभ या कुशा के रूप उत्पन्न हुए। इसके बाद कुशा का इस्तेमाल यज्ञ में विघ्न बाधाओं को दूर करने के लिए किया जाने लगा।

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