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Sawan 2019: यहां मौजूद है भगवान शिव का अंतिम ज्योतिर्लिंग, जानें इसकी पौराणिक कथा

शिव महापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता है कि शिव अपनी प्रिय भक्त घुश्मा के मृत पुत्र को जीवित करने के लिए यहां अवतरित हुए थे। मान्यता है कि भगवान शिव के यहां आकर दर्शन करने से दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति हो जाती है।

Author नई दिल्ली | July 3, 2019 12:55 PM
घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक घुमेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के दौलताबाद से लगभग 18 किलोमीटर दूर बेरूलठ गांव के पास स्थित है। यह शिव का अंतिम ज्योतिर्लिंग है जिसे घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। शिव महापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता है कि शिव अपनी प्रिय भक्त घुश्मा के मृत पुत्र को जीवित करने के लिए यहां अवतरित हुए थे। मान्यता है कि भगवान शिव के यहां आकर दर्शन करने से  दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति हो जाती है। जानिए इस संबंध में एक पौराणिक कथा…

कहा जाता है कि दक्षिण दिशा के देवगिरी पर्वत के पास सुधर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। जिसकी पत्नी का नाम सुदेहा था। दोनों संतान सुख से वंचित थे। संतान प्राप्ति की इच्छा से सुदेहा ने अपने पति को अपनी छोटी बहन घुश्मा से विवाह करने को कहा। पत्नी के कहने पर सुधर्मा ने घुश्मा से विवाह कर लिया। विवाह के बाद दोनों बहनें प्रेम से रहने लगीं। घुश्मा भगवान शिव की बड़ी भक्त थी, वह रोज सौ पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा के बाद उन्हें एक सरोवर में विसर्जित कर देती थी। कुछ समय बाद घुश्मा को पुत्र की प्राप्ति हुई जिससे सुदेहा को जलन होने लगी। जलन वश सुदेहा ने घुश्मा के पुत्र का वध कर दिया और उसके शव को उसी सरोवर में फेंक दिया, जहां घुश्मा अपने शिवलिंगों को विसर्जित करती थी।

इतनी विपरीत परिस्थिति के बाद भी घुष्मा ने अपनी शिव भक्ति नहीं छोड़ी और वह रोज की तरह ही शिव की पूजा करती रही। पूजा के बाद जब घुश्मा शिवलिंगों को सरोवर में विसर्जित करने गई तो उसका पुत्र सरोवर के किनारे जीवित खड़ा था। अपने पुत्र की मृत्यु का कारण जानने पर भी घुश्मा के मन में अपनी बड़ी बहन के प्रति जरा भी क्रोध नहीं आया। घुश्मा की भक्ति से खुश होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। भगवान शिव के ऐसा कहने पर घुश्मा ने भगवान से अपनी बहन के अपराध को मांफ करने और हमेशा इसी स्थान पर रहने का वरदान मांगा। घुश्मा के कहने पर भगवान यहां घुश्मेश्वर लिंग के रूप स्थापित हो गए।

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