Matsya Avatar Katha: हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार माना गया है। कहा जाता है कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है या सृष्टि पर कोई संकट आता है, तब भगवान विभिन्न रूपों में अवतार लेकर जगत का कल्याण करते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान के 10 अवतारों का उल्लेख मिलता है। इन्हीं अवतारों में से एक है ‘मत्स्य अवतार’। उन्होंने इस अवतार को रखकर न केवल असुर हयग्रीव से ब्रह्मा जी से वेदों की रक्षा की थी, बल्कि प्रलय काल से पृथ्वी के हर एक प्राणी की भी रखा की थी। आइए आज ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं भगवान विष्णु के पहले अवतार मत्स्य अवतार के बारे में…
शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को सुनाई गई यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर का प्रत्येक रूप, चाहे वह कितना ही साधारण क्यों न लगे, परम कल्याणकारी और दिव्य होता है।
शुक्रदेव ने स्वयं राजा परीक्षित को सुनाई ये कथा
श्रीमद्भागवत महापुराण के स्कंध 8 के अध्याय 24 में भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का वर्णन है। इस अवतार को शुक्रदेव जी ने स्वयं राजा परीक्षित को सुनाया था। राजा परीक्षित्ने पूछा कि भगवान ने कर्म बड़े अद्भुत हैं। उन्होंने एक बार अपनी योगमाया से मत्स्यावतार धारण करके बड़ी सुन्दर लीला की थी, मैं उनके उसी आदि-अवतार की कथा सुनना चाहता हूं। भगवन, मत्स्ययोनि एक तो यों ही लोकनिन्दित है, दूसरे तमोगुणी और असह्य परतन्त्रता से युक्त भी है। सर्वशक्तिमान् होने पर भी भगवान ने कर्म बन्धन में बंधे हुए जीव की तरह यह मत्स्य का रूप क्यों धारण किया? भगवन्, महात्माओं के कीर्तनीय भगवान का चरित्र समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाला है। आप कृपा करके उनकी वह सब लीला हमारे सामने पूर्ण रूप से वर्णन कीजिए।
सूतजी कहते हैं कि शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षित् ने भगवान् श्री शुकदेवजी से यह प्रश्न किया, तब उन्होंने विष्णु भगवान का वह चरित्र जो उन्होंने मत्स्यावतार धारण करके किया था और वर्णन किया।
श्री शुकदेव जी कहते हैं कि परीक्षित, यों तो भगवान सबके एकमात्र प्रभु हैं। फिर भी वे गौ, ब्राह्मण, देवता, साधु, वेद, धर्म और अर्थकी रक्षाके लिये शरीर धारण किया करते हैं।
श्री विष्णु ने मत्स्य अवतार लेकर की वेदों की रक्षा
वे सर्वशक्तिमान् प्रभु वायु की तरह नीचे-ऊंचे, छोटे-बड़े सभी प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से लीला करते रहते हैं। परंतु उन-उन प्राणियों के बुद्धिगत गुणों से वे छोटे-बड़े या ऊंचे-नीचे नहीं हो जाते। क्योंकि वे वास्तव में समस्त प्राकृत गुणों से रहित निर्गुण हैं। परीक्षित्! पिछले कल्पके अन्त में ब्रह्माजी के सो जाने के कारण ब्राह्म नामक नैमित्तिक प्रलय हुआ था। उस समय भूलोक आदि सारे लोक समुद्र में डूब गये थे। प्रलयकाल आ जाने के कारण ब्रह्मा जी को नींद आ रही थी, वे सोना चाहते थे। उसी समय वेद उनके मुखसे निकल पड़े और उनके पास ही रहने वाले हयग्रीव नामक बली दैत्य ने उन्हें योगबल से चुरा लिया। सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि ने दानव राज हयग्रीव की यह चेष्टा जान ली। इसलिये उन्होंने मत्स्यावतार ग्रहण किया।
विष्णु जी ने लिया अपने भक्त सत्यव्रत की परीक्षा
परीक्षित्! उस समय सत्यव्रत नाम के एक बड़े उदार एवं भगवत्परायण राजर्षि केवल जल पीकर तपस्या कर रहे थे। वही सत्यव्रत वर्तमान महाकल्प में विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र श्राद्ध देव के नाम से विख्यात हुए और उन्हें भगवान ने वैवस्वत मनु बना दिया। एक दिन वे राजर्षि कृत माला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे। उसी समय उनकी अंजलि के जल में एक छोटी-सी मछली आ गयी।
परीक्षित्! द्रविड देश के राजा सत्यव्रत ने अपनी अंजलि में आयी हुई मछली को जल के साथ ही फिर से नदी में डाल दिया। उस मछली ने बड़ी करुणा के साथ परम दयालु राजा सत्यव्रत से कहा कि राजन्! आप बड़े दीनदयालु हैं। आप जानते ही हैं कि जल में रहने वाले जन्तु अपनी जाति वालों को भी खा डालते हैं। मैं उनके भय से अत्यंत व्याकुल हो रही हूं। आप मुझे फिर इसी नदी के जल में क्यों छोड़ रहे हैं?
राजा सत्यव्रत को इस बात का पता नहीं था कि स्वयं भगवान् मुझपर प्रसन्न होकर कृपा करनेके लिये मछली के रूप में पधारे हैं। इसलिये उन्होंने उस मछली की रक्षा का मन-ही-मन संकल्प किया। राजा सत्यव्रत ने उस मछली की अत्यन्त दीनता से भरी बात सुनकर बड़ी दया से उसे अपने पात्र के जलमें रख लिया और अपने आश्रमपर ले आए।
आश्रम पर लाने के बाद एक रात में ही वह मछली उस कमण्डल में इतनी बढ़ गयी कि उसमें उसके लिये स्थान ही न रहा। उस समय मछली ने राजा से कहा कि अब तो इस कमण्डल में मैं कष्टपूर्वक भी नहीं रह सकती। अतः मेरे लिये कोई बड़ा-सा स्थान नियत कर दें। जहा मैं सुखपूर्वक रह सकूं।
राजा सत्यव्रत ने मछली को कमंडल से निकालकर एक बहुत बड़े पानी के मटके में रख दिया। परंतु वहां डालने पर वह मछली दो ही घड़ी में तीन हाथ बढ़ गयी। फिर उसने राजा सत्यव्रत से कहा कि राजन् अब यह मटका भी मेरे लिये पर्याप्त नहीं है। इसमें मैं सुख पूर्वक नहीं रह सकती। मैं तुम्हारी शरण में हूं। इसलिए मेरे रहने योग्य कोई बड़ा-सा स्थान मुझे दो।
परीक्षित्! सत्यव्रत ने वहां से उस मछली को उठाकर एक सरोवर में डाल दिया। परंतु वह थोड़ी ही देर में इतनी बढ़ गयी कि उसने एक महामत्स्य का आकार धारण कर उस सरोवरके जलको घेर लिया और कहा कि राजन्! मैं जलचर प्राणी हूं। इस सरोवर का जल भी मेरे सुखपूर्वक रहने के लिये पर्याप्त नहीं है। इसलिये आप मेरी रक्षा कीजिए और मुझे किसी अगाध सरोवर में रख दीजिए।
मत्स्य भगवान ने इस प्रकार कहने पर वे एक-एक करके उन्हें कई अटूट जल वाले सरोवरों में ले गये। परन्तु जितना बड़ा सरोवर होता, उतने ही बड़े वे बन जाते। अन्त में उन्होंने उन लीला मत्स्य को समुद्र में छोड़ दिया। समुद्र में डालते समय मत्स्य भगवान ने सत्यव्रत से कहा कि वीर, समुद्र में बड़े-बड़े बली मगर आदि रहते हैं, वे मुझे खा सकते हैं। अतः मुझे इसमें छोड़ना आपको उचित नहीं है’
इस तरह विष्णु जी से मत्स्य अवतार लेकर की हर एक प्राणी की रक्षा
मत्स्य भगवान की यह मधुर वाणी सुनकर राजा सत्यव्रत मोह मुग्ध हो गये। उन्होंने कहा कि मत्स्य का रूप धारण करके मुझे मोहित करने वाले आप कौन हैं?। आपने एक ही दिन में चार सौ कोस के विस्तार का सरोवर घेर लिया। आज तक ऐसी शक्ति रखने वाला जलचर जीव तो न मैंने कभी देखा था और न सुना ही था। अवश्य ही आप साक्षात् सर्वशक्तिमान् सर्वान्तर्यामी अविनाशी श्रीहरि हैं। जीवों पर अनुग्रह करनेके लिये ही आपने जलचर का रूप धारण किया है।
श्री भगवान् ने कहा कि सत्यव्रत! आज से सातवें दिन भूर्लोक आदि तीनों लोक प्रलय के समुद्र में डूब जायेंगे। उस समय जब तीनों लोक प्रलयकाल की जलराशि में डूबने लगेंगे, तब मेरी प्रेरणा से तुम्हारे पास एक बहुत बड़ी नौका आएगी।
उस समय तुम समस्त प्राणियों के सूक्ष्म शरीरों को लेकर सप्तर्षियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना और समस्त धान्य तथा छोटे-बड़े अन्य प्रकार के बीजों को साथ रख लेना। उस समय सब ओर एकमात्र महासागर लहराता होगा। प्रकाश नहीं होगा। केवल ऋषियों की दिव्य ज्योति के सहारे ही बिना किसी प्रकार की विकलता के तुम उस बड़ी नाव पर चढ़कर चारों ओर विचरण करना। जब प्रचण्ड आंधी चलने के कारण नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं इसी रूप में वहां आ जाऊंगा और तुम लोग वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध देना।
सत्यव्रत! इसके बाद जब तक ब्रह्माजी की रात रहेगी तब तक मैं ऋषियों के साथ तुम्हें उस नाव में बैठाकर उसे खींचता हुआ समुद्र में विचरण करूंगा। उस समय जब तुम प्रश्न करोगे तब मैं तुम्हें उपदेश दूंगा। मेरे अनुग्रह से मेरी वास्तविक महिमा, जिसका नाम ‘परब्रह्म’ है, तुम्हारे हृदय में प्रकट हो जाएगी और तुम उसे ठीक-ठीक जान लोगे।
भगवान राजा सत्यव्रत को यह आदेश देकर अन्तर्धान हो गये। अतः अब राजा सत्यव्रत उसी समय की प्रतीक्षा करने लगे, जिसके लिये भगवान्ने आज्ञा दी थी। कुशों का अग्रभाग पूर्वकी ओर करके राजर्षि सत्यव्रत उन पर पूर्वोत्तर मुख से बैठ गये और मत्स्य रूप भगवान के चरणों का चिन्तन करने लगे।
इतनेमें ही भगवान ने बताया हुआ वह समय आ पहुंचा। राजा ने देखा कि समुद्र अपनी मर्यादा छोड़कर बढ़ रहा है। प्रलयकाल के भयङ्कर मेघ वर्षा करने लगे। देखते-ही-देखते सारी पृथ्वी डूबने लगी। तब राजा ने भगवान की आज्ञा का स्मरण किया और देखा कि नाव भी आ गयी है। तब वे धान्य तथा अन्य बीजों को लेकर सप्तर्षियों के साथ उसपर सवार हो गए। सप्तर्षियोंने बड़े प्रेम से राजा सत्यव्रतसे कहा— ‘राजन्! तुम भगवान का ध्यान करो। वे ही हमें इस संकट से बचायेंगे और हमारा कल्याण करेंगे। इस प्रकार से भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लेकर पृथ्वी के समस्त प्राणियों की रक्षा की थी। इसके बाग ब्रह्मा जी के जागने पर दोबारा संसार बनाया था।
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।
