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Sita Navami 2020: 2 मई को मनाई जायेगी सीता नवमी, जानिए पूजा मुहूर्त और मां जानकी की बर्थ स्टोरी

Sita Navami Puja Vidhi And Muhurat: हिंदू मान्यताओं अनुसार माता सीता का प्राकट्य त्रेतायुग में वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इस बार ये तिथि 2 मई को पड़ रही है।

हिंदू मान्यताओं अनुसार माता सीता का प्राकट्य त्रेतायुग में वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था।

Sita Navami Puja Vidhi, Muhurat, Katha: हिंदू धर्म में सीता नवमी का दिन बेहद ही खास और पवित्र माना जाता है। इस दिन श्रीराम की पत्नि माता सीता का माता सीता का प्राकट्योत्सव हैं इसे जानकी नवमी भी कहा जाता है। भक्त इस खास दिन पर व्रत रख माता सीता और श्रीराम की अराधना करते हैं। हिंदू मान्यताओं अनुसार माता सीता का प्राकट्य त्रेतायुग में वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इस बार ये तिथि 2 मई को पड़ रही है। मान्यता है कि देवी सीता की पूजा करने से वैवाहिक महिलाओं को सुहाग का वरदान प्राप्त होता हैं। जानिए सीता नवमी की पूजा विधि, मुहूर्त और कथा…

सीता नवमी मुहूर्त (Sita Navami Muhurat):

सीता नवमी मध्याह्न मुहूर्त – 10:37 ए एम से 01:13 पी एम
अवधि – 02 घण्टे 36 मिनट्स
सीता नवमी मध्याह्न का क्षण – 11:55 ए एम
नवमी तिथि प्रारम्भ – मई 01, 2020 को 01:26 पी एम बजे
नवमी तिथि समाप्त – मई 02, 2020 को 11:35 ए एम बजे

सीता नवमी पूजा विधि (Sita Navami Puja Vidhi):

सीता नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें। पूजा वाले स्‍थान को साफ करने के बाद आम के पत्तों और फूल से एक मंडप तैयार कर लें। फिर मंडप के बीच में एक चौकी लगाकर उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं उसे फूलों से सजा लें। इसके बाद चौकी पर भगवान राम और माता सीता की प्रतिमा स्थापित करें। पूजन सामग्री के तौर पर चावल, जौ, तिल आदि का प्रयोग करें।

माता सीता की जन्म स्टोरी: पौराणिक कथा अनुसार मिथिला राज्य में अकाल पड़ गया था। ऋषियों ने राजा जनक से यज्ञ का आयोजन करने के लिए कहा ताकि वर्षा हो। यज्ञ की समाप्ति के अवसर पर राजा जनक अपने हाथों से हल लेकर खेत जोत रहे थे तभी उनके हल का नुकीला भाग जिसे सीत कहते हैं किसी कठोर चीज से टकराया और हल वहीं अटक गया। जब उस स्थान को खोदा गया तो एक कलश प्राप्त हुआ जिसमें एक सुंदर कन्या खेल रही थी। राजा जनक ने उस कन्या को कलश से निकाला और उस कन्या को अपनी पुत्री बनाकर अपने साथ ले गए। निःसंतान सुनयना और जनक की संतान की इच्छा पूरी हुए। हल के सीत के टकराने से वह कलश मिला था जिससे सीता प्रकट हुई थीं इसलिए कन्या का नाम सीता रखा गया।

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