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पूजा-पाठ में क्या है आसन का महत्व और किस आसन पर बैठकर पूजन करना माना गया है शुभ, जानिए

बिना आसन भूमि पर बैठकर मंत्र जाप करने से दुख की प्राप्ति होती है। वहीं बांस के आसन पर बैठकर मंत्र जाप या देव-पूजा नहीं करनी चाहिए।

सांकेतिक तस्वीर।

धार्मिक कार्यों में पूजन या जप के दौरान आसन का प्रयोग सदियों से चला आ रहा है। पूजा-पाठ घर में हो या किसी देव मंदिर में, बैठकर पूजन करने के लिए हम आसन का उपयोग करते हैं। शास्त्रों में हर प्रकार की कामना के लिए अलग-अलग आसन बताए गए हैं। लेकिन नित्य पूजा करते समय कैसा आसन होना चाहिए, यह बात आज भी शायद बहुत कम लोग ही जानते हैं। क्या बिना आसन पूजा हम कर सकते हैं या आसन बिछाए बिना क्या हम पूजा-पाठ कर सकते हैं? अगर हम ऐसा करते हैं तो उसका क्या फल मिलता है? यदि आप इन सब बातों को नहीं जानते हैं तो चलिए आगे इसे जानते हैं।

शास्त्रों के अनुसार मंत्र जाप करते समय हमेशा आसन बिछाना चाहिए। बिना आसन भूमि पर बैठकर मंत्र जाप करने से दुख की प्राप्ति होती है। वहीं बांस के आसन पर बैठकर मंत्र जाप या देव-पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से दरिद्रता आती है। पत्थर के आसन पर बैठकर पूजा या मंत्र जाप रोग होते हैं। साथ ही लकड़ी के आसन पर बैठकर पूजा करने से दुर्भाग्य की प्राप्ति होती है। घास के आसन पर बैठकर पूजा करने से यश और कीर्ति नष्ट हो जाती है। पत्ते के आसन पर बैठकर पूजा करने से मन बेचैन रहता है। यही कारण है कि पूजा के दौरान हमेशा अच्छे आसन का इस्तेमाल करना चाहिए।

वहीं शास्त्रों में भी यह बताया गया है कि पूजन के दौरान किस प्रकार के आसन का प्रयोग करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि पूजन के लिए रेशम, कंबल, मृगचर्म, काष्ठ और तालपत्र के आसन का प्रयोग शुभ कार्यों के लिए करना चाहिए। वहीं शमी, श्रीपर्णी, कदंब, खेर और कश्मीरी शाला ये पांच प्रकार के आसन श्राद्ध और देव-अर्चन के लिए शुभ है। इसके अलावा कामना के अनुसार किस प्रकार का आसन होना चाहिए यह भी शास्त्रों में बताया गया है। जिसमें व्याघ्रचर्म का आसन सभी प्रकार की सिद्धियों के लिए शुभ है। ज्ञान और सिद्धि के लिए मृगचर्म का आसन शुभ मान गया है। वस्त्र का आसन रोगों से छुटकारा दिलाने वाला होता है।

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