पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी लेखक, कवि, कथावाचक और धार्मिक चिंतक थे। वहीं उन्होंने सबसे प्रचलित आरती ‘ॐ जय जगदीश हरे’ लिखी थी, जिसके लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है। पंडित श्रद्धा राम शर्मा का साहित्यिक और धार्मिक योगदान हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं में महत्वपूर्ण माना जाता है। इनका सबसे फेमस उपन्यास भाग्यवती है।

पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी का जीवन परिचय

पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी का जन्म 30 सितंबर 1837 को पंजाब के फिल्लौर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित जय दयालु बताया जाता है। बचपन से ही उन्हें हिंदी, संस्कृत, पंजाबी, फारसी, उर्दू, ज्योतिष और संगीत का ज्ञान प्राप्त हुआ। उनके पिता काफी विद्वान थे और ज्योतिष के जानकार थे।

वहीं आपको बता दें कि कम उम्र में ही श्रद्धा राम का झुकाव धार्मिक कथाओं और प्रवचनों की ओर हो गया। वहीं करीब 18-19 साल की आयु में वे महाभारत, रामायण और श्रीमद्भागवत की कथाओं का वाचन करने लगे। साथ ही उनके प्रभावशाली कथावाचन और धार्मिक ज्ञान के कारण उन्हें पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसिद्धि मिली।

‘ॐ जय जगदीश हरे’ से मिली अमर पहचान

पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी की सबसे प्रसिद्ध रचना ‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती है। यह आरती आज भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में हिंदू परिवारों और मंदिरों में श्रद्धा के साथ गाई जाती है। वहीं इन्होंने हिंदी, पंजाबी और उर्दू में कई रचनाएं लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘भाग्यवती’, ‘सत्य धर्म मुक्तावली’, ‘धर्म रक्षा’, ‘धर्म संवाद’, ‘पंजाबी बात-चीत’ और ‘सतोपदेश’ आदि का उल्लेख मिलता है।

शिक्षा और समाज के लिए योगदान

श्रद्धा राम फिल्लौरी ने धार्मिक शिक्षा और साहित्य के प्रचार- प्रसार किया। उन्होंने लुधियाना में एक हिंदू स्कूल की स्थापना में योगदान दिया, जहां संस्कृत और फारसी जैसी भाषाओं की शिक्षा दी जाती थी। वहीं पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी ने फिल्लौर में श्री हरि मंदिर का निर्माण करवाया और उसके प्रबंधन का काम काज महिलाओं को दिया। आज भी शहर के बीचों बीच स्थित इस मंदिर के प्रबंधन की कमान महिलाओं के हाथ में ही है।

पंडित श्रद्धाराम का निधन

पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी का निधन 24 जून 1881 को लाहौर में हुआ। उस समय उनकी उम्र लगभग 43 वर्ष थी।

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