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कनखल में होती है शिव और शक्ति की पूजा

इस सिद्ध स्थल पर तारामाता के उग्र नहीं बल्कि शांत स्वरूप की पूजा होती है।

Author Published on: February 3, 2020 3:29 AM
राजा दक्ष की बेटी सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध भोलेनाथ भगवान शिव से विवाह किया था।

मायानगरी हरिद्वार की उपनगरी कनखल देवों के देव महादेव की ससुराल है और यह शिव की अर्धांगिनी सती का जन्मस्थल भी है और संहार स्थल भी। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के मानस पुत्र और पृथ्वी के प्रथम राजा दक्ष की राजधानी कनखल ही मानी जाती है। राजा दक्ष की बेटी सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध भोलेनाथ भगवान शिव से विवाह किया था। सती के मायके कनखल में उनके पिता राजा दक्ष द्वारा एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया था, जिसमें भगवान शंकर आमंत्रित नहीं थे। अपने पति से जिद कर सती इस यज्ञ में भाग लेने पहुंची। जहां उन्होंने अपने पति भगवान शंकर का अपमान होते देखा और वे कुपित होकर यज्ञशाला में स्थित यज्ञ कुंड में कूदकर खुद को भस्म कर लिया। मान्यता है कि यज्ञ कुंड में कूदने से पहले सती ने क्रोधित होकर कनखल नगरी को श्राप दिया था। इसलिए कनखल नगरी श्मशान भूमि कहलाती है। इस भूमि में शिव और शक्ति की पूजा का विशेष महत्व है। इसीलिए शिव और शक्ति दोनों के उपासक इस स्थल पर साधना करने के लिए सदियों से आते रहते हैं।

इसी क्रम में तंत्र साधकों की नगरी बंगाल के कोलकाता से करीब सवा सौ साल पहले तंत्र साधना के उच्च कोटि के साधक स्वामी महानंद गिरी अपने शिष्यों के साथ कनखल नगरी के पहाड़ी बाजार स्थित गंगा तट पर आए। उन्होंने यहां पर तारा देवी के शांत स्वरूप वैष्णवी मां की पूजा की। मां तारा के दो रूप माने जाते हैं- एक उग्रतारा और दूसरा शांत तारा। कनखल के महानंद मिशन में मां तारादेवी वैष्णवी रूप में विद्यमान है, जो प्रसिद्ध सिद्ध तारामाता पीठ है और भक्तों को आशीर्वाद दे उनका कल्याण करती है। यह स्थल मां तारा देवी के शांत भाव से पूजा करने वाले साधकों के लिए एक बहुत बड़ा तीर्थ है। तारापीठ सिद्ध स्थल की संचालिका स्वामी मां रत्नागिरी ने बताया कि 108 साल पहले 20 मई के दिन मिशन के संस्थापक स्वामी महानंदगिरि ‘पिताजी महाराज’ को मां तारा देवी ने एक कन्या के रूप में साक्षात दर्शन दिए थे। तभी से महानंद मिशन कनखल के मां तारादेवी मंदिर में हर वर्ष 20 मई को कन्या पूजन एवं प्रसाद वितरण का आयोजन किया जाता है। कनखल के पहाड़ी बाजार में श्री पंचायती उदासीन नया अखाड़ा की छावनी में शिवजी का मंदिर स्थापित हैं। मान्यता है कि इस मंदिर से शिवजी की बारात चढ़ी थी। शिवजी इस स्थल पर स्वयं पधारे थे। तभी यहां शिवजी ने स्वयं शिवलिंग स्थापित किया था। शिवजी के इस पौराणिक मंदिर के ठीक सामने गंगा के पूर्वी छोर में गंगा के पावन तट पर मां तारा देवी अपने दिव्य-भव्य-सिद्ध वैष्णवी रूप में विराजमान है।

इस सिद्ध स्थल पर तारामाता के उग्र नहीं बल्कि शांत स्वरूप की पूजा होती है। मां तारा देवी के शांत रूप को ही वैष्णवी तारा देवी के रूप में माना जाता है। जिसका पहला एवं अकेला मंदिर कनखल के महानंद मिशन में ही स्थापित है और उस विशेष पवित्र स्थान पर स्थापित है, जहां मां तारा स्वयं कन्या रूप में साक्षात अवतरित हुई थी। इस तारा सिद्धपीठ के परिसर में देवों के देव महादेव का भी दिव्य-भव्य-सिद्ध मंदिर स्थित है। इस सिद्धपीठ में तारा माता के वैष्णवी स्वरूप के साथ-साथ शिवलिंग, शिव-पार्वती प्रतिमा, श्री राम दरबार, श्री राधाकृष्ण, भगवान जगन्नाथ की प्रतिमाएं हैं। यहां भोलेनाथ का त्रिशूल और सिद्ध तारामंत्र स्थापित है,जो अत्यंत दुर्लभ है। साथ ही इस सिद्ध

तारापीठ में आदिगुरू तेलंग स्वामी, स्वामी महानंद गिरी ‘पिताजी महाराज’, स्वामी भवानंद गिरी ‘पिताजी महाराज’ एवं स्वामी विमलानंद गिरी महाराज के पावन चित्र विद्यमान हैं। मां तारादेवी के वैष्णवी स्वरूप के इस पावन पवित्र सिद्ध तारा माता मंदिर पीठ का सौंदर्यीकरण सन 1997 में स्वामी विमलानंद गिरि महाराज ने करवाया था। जबकि श्री महादेव के मंदिर का सौंदर्यीकरण स्वामी रत्नागिरि ने तारामाता और शिवभक्तों की पूजा पाठ-अचर्ना एवं भजन कीर्तन हेतु लोककल्याण के लिए करवाया था। तारामाता सिद्धपीठ मां तारा देवी, शिव जी, हनुमान जी एवं मां गंगा जी के भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कई श्रद्धालु साधना के लिए यहां महीनों तक रह कर मां तारादेवी की जप-तप-पूजा करते हैं। सिद्ध साधकों के लिए यह प्रमुख तीर्थ स्थल है।

सुनील दत्त पांडेय

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