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कल है भौम प्रदोष व्रत, जानिये कथा और आरती

Pradosh Vrat September 2020 : प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है। यह व्रत महीने में दो बार रखा जाता है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है।

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Pradosh Vrat September 2020 : प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है। यह व्रत महीने में दो बार रखा जाता है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। इस बार यह व्रत 29 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा‌। मंगलवार के दिन प्रदोष व्रत होने से इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। भौम प्रदोष व्रत में भगवान शिव के साथ हनुमान जी की पूजा भी जरूर करनी चाहिए।

भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhauma Pradosh Vrat Katha)
एक दिन हनुमान जी सीता जी की शरण में आए। आंखों में आंसू लिए वह सिर झुकाए वहीं बैठ गए। सीता जी ने उनसे पूछा उनसे हनुमान जी क्या हुआ? आप इतने उदास क्यों हैं?हनुमान जी बोले माता आपने मुझे वरदान दिए हैं, अजर अमर की पदवी दी है और बहुत सम्मान दिए हैं। अब मैं उन्हें लौटानें आया हूं। क्योंकि मुझे अमर पद नहीं चाहिए। क्योंकि इस वजह से मुझे श्रीराम से दूर रहना पड़ेगा।

सीता जी मुस्कुराकर बोली हनुमान जी ये क्या बोल रहे हो, अमृत को तो देव भी तरसते हैं फिर आप इसके लिए मना क्यों कर रहे हैं। इतने में वहां श्रीराम आ गए और हनुमान जी के उदास होने का कारण पूछा।तब सीताजी  बोली सुनो नाथ जी न जाने क्या हुआ हनुमान को यह मुझे अमर पदवी लौटाने आए हैं। इस पर श्रीराम हनुमान जी से ऐसा करने की वजह पूछते हैं।

हनुमान जी रोकर बोले प्रभु मुझे इस धरती पर छोड़कर आप अपने धाम साकेत पधार रहे हों। आपके बिना मेरा जीवन अमृत का विष पीना होगा। अब आप ही बताओ मैं यहां आपके बिना कैसे रहूंगा। इस पर श्रीराम ने कहा हनुमान सीता का यह वरदान सिर्फ आपके लिए ही नहीं है। बल्कि यह तो संसार भर के कल्याण के लिए है। तुम यहां रहोगे, और संसार का कल्याण करोगे। यह कहकर हनुमान जी को वरदान मांगने को कहा।

इस पर हनुमान जी बोले जहां जहां पर आपकी कथा हो, आपका नाम हो, वहां-वहां पर मैं उपस्थित होकर हमेशा आनंद लिया करूं।श्रीराम बोले तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो‌। जहां भी मेरी कथा होगी, मेरा नाम लिया जाएगा वहां तुम उपस्थित रहोगे।

भौम प्रदोष व्रत आरती (Bhauma Pradosh Vrat Aarti)
जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ॐ जय शिव॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ॐ जय शिव॥
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ॐ जय शिव॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ॐ जय शिव॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ॐ जय शिव॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ॐ जय शिव॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका ॥ॐ जय शिव॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ॐ जय शिव॥
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ॐ जय शिव॥

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