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कब है अधिक मास का आखिरी प्रदोष व्रत, शुभ मुहूर्त में इस विधि से पूजा करने से भोलेनाथ के प्रसन्न होने की है मान्यता

ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक इस बार 14 अक्तूबर, बुधवार को प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) रखा जाएगा। यह व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

shiv pradosh vrat, pradosh vrat, shivप्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है।

Shiv Pradosh Vrat/ Pradosh Vrat Pujan Vidhi : हिन्दू पंचांग के अनुसार अधिक मास (Adhik Maas) के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि (Troyadashi Tithi) के दिन प्रदोष व्रत किया जाएगा। ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक इस बार 14 अक्तूबर, बुधवार को प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) रखा जाएगा। यह व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

कहते हैं कि जो व्यक्ति सच्चे मन से संकल्प लेकर त्रयोदशी के दिन प्रदोष व्रत रखता है भगवान शिव उनके जीवन से सभी दुखों, कष्टों और संकटों को दूर करते हैं। प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat Puja) के दिन भोलेनाथ की उपासना विधि-विधान से की जानी चाहिए। मान्यता है कि विधि-विधान से भगवान भोलेनाथ की पूजा करने से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं।

प्रदोष व्रत पूजा विधि (Pradosh Vrat Puja Vidhi)
त्रयोदशी के दिन सूर्योदय से पहले उठें। स्नानादि कर सफेद या बादामी रंग के वस्त्र पहनें।
फिर पूजन स्थल की सफाई करें। गंगाजल के छींटे मारकर स्थान को पवित्र करें।
सफेद रंग के आसन पर बैठें।
पूजन स्थल पर एक चौकी रखें। उस पर सफेद रंग का कपड़ा बिछाएं।

इस कपड़े पर स्वास्तिक बनाएं। फिर चावल और फूलों के साथ स्वास्तिक का पूजन करें।
फिर चौकी पर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें सफेद फूलों की माला पहनाएं।
सरसों के तेल का दीपक जलाएं। साथ ही धूप और अगरबत्ती भी जलाएं।
इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।

संकल्प करने के बाद भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना करें।
शिव चालीसा, शिव स्तुति, शिव स्तोत्र और शिव मंत्रों से भगवान शिव की उपासना करें।
अब भगवान भोलेनाथ को अपनी मनोकामना बताते हुए उनसे प्रार्थना करें कि वह आपके मनोरथ को पूरा करें।
इसके बाद भगवान शिव की आरती करें। आरती करने के बाद पूजा में हुए अपराधों के लिए क्षमा मांगें।

माना जाता है कि भोलेनाथ को खीर को भोग अत्यंत प्रिय है। इसलिए संभव हो तो भोलेनाथ को पूजा करने के बाद खीर का भोग लगाएं।
फिर इस खीर के प्रसाद को परिवार के सभी सदस्यों को बांटें।
संभव हो तो आठ साल से छोटी कन्याओं को भी खीर का प्रसाद जरूर दें।
इसके बाद स्वयं भी प्रसाद लें।

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