हिंदू धर्म में भगवान शेषनाग का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे केवल नागों के राजा ही नहीं, बल्कि सृष्टि की गति, समय और संतुलन के प्रतीक भी हैं। उनकी उपस्थिति केवल भगवान विष्णु के शयन आधार तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे ब्रह्मांडीय व्यवस्था में उनका गहरा और व्यापक महत्व है। समस्त नागों के स्वामी भगवान शेषनाग, जिन्हें आदि शेष या अनंत भी कहा जाता है। शेष’ का अर्थ है जो अंत समय में भी बचा रहे, इसीलिए उन्हें ‘अनंत’ कहा जाता है। वे समय और धैर्य के प्रतीक हैं। क्षीर सागर में भगवान विष्णु के शयन का आधार हैं। यही आदि शेष अपने अनेक फनों पर संपूर्ण ब्रह्मांड और ग्रहों का भार धारण किए हुए हैं। सृष्टि के निर्माण और विनाश में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। आइए आज ‘धर्म गाथा’ की श्रृंखला में जानते हैं शेषनाग से संबंधित ये पौराणिक कथा…

कौन थे शेषनाग?

महाभारत सहित कई अन्य ग्रंथों में शेषनाग के बारे में विस्तार से बताया गया है। बता दें कि ब्रह्मा जी के छह मानस पुत्रों में से एक मरीचि थे। मरीचि के पुत्र दक्ष प्रजापति ने अपनी 17 पुत्रियों का विवाह महर्षि कश्यप से किया। इन पुत्रियों में कद्रू और विनता प्रमुख थीं।

महाभारत के आदि पर्व (अध्याय 35) के अनुसार, वरदान प्राप्त करने के बाद कद्रू ने एक हजार नागों को जन्म दिया, जिनमें सबसे पहले शेषनाग का प्राकट्य हुआ। एक समय कद्रू और उसके पुत्रों ने छल से विनता और उसके पुत्रों को दास बना लिया। इस अन्याय से दुखी होकर शेषनाग ने अपने परिवार से दूरी बना ली और केवल वायु का सेवन करते हुए कठोर तपस्या में लीन हो गए।

ब्रह्मा जी से आदेश पर अपने सिर उठाया पृथ्वी का बोझ

शेषनाग ने अपनी इंद्रियों को वश में करके नियमपूर्वक रहते हुए शेषजी गंधमादन पर्वत पर जाकर बदरिकाश्रम तीर्थ में तप करने लगे। तत्पश्चात् वे गोकर्ण, पुष्कर, हिमालय के तटवर्ती प्रदेश तथा भिन्न-भिन्न पुण्य-तीर्थों और देवालयों में जा-जाकर संयम और नियम के साथ एकान्तवास करने लगे।

ब्रह्माजी ने देखा कि शेषनाग घोर तप में संलग्न हैं। उनके शरीर का मांस, त्वचा और नाड़ियाँ सूख गई हैं। वे सिर पर जटा और शरीर पर वल्कल वस्त्र धारण किये हुए मुनिवृत्ति से रहते हैं। उनकी दृढ़ तपस्या देखकर ब्रह्माजी उनके पास आए और बोले कि शेष! तुम यह क्या कर रहे हो? समस्त प्रजा का कल्याण करो। अनघ, इस तीव्र तपस्या द्वारा तुम सम्पूर्ण प्रजावर्ग को संतप्त कर रहे हो। शेषनाग! तुम्हारे हृदय में जो कामना हो वह मुझसे कहो।

शेषनाग ने उत्तर दिया कि वे परस्पर शत्रु की भांति एक-दूसरे के दोष निकालते रहते हैं। इससे ऊबकर उन्होंने तपस्या में लगना उचित समझा, ताकि वे उन दुष्टों को देख न सकें। वे विनता और उसके पुत्रों से द्वेष रखते हैं। आकाश में विचरने वाले विनता-पुत्र गरुड भी उनके दूसरे भाई हैं, और इनके बल से वे परेशान रहते हैं। इन सब कारणों से उन्होंने निश्चय किया कि तपस्या करके वे इस शरीर को त्याग देंगे, जिससे मरने के बाद भी किसी तरह उन दुष्टों से उनका समागम न हो।

यह सुनकर ब्रह्माजी ने कहा कि शेषनाग के भाइयों की कुचेष्टा उन्हें ज्ञात है, परंतु जो परिहार अपेक्षित है, उसकी व्यवस्था पहले से कर रखी गई है। अतः उन्हें अपने भाइयों के लिए शोक नहीं करना चाहिए और जो अभीष्ट हो वह वर मुझसे मांग सकते हैं। शेषनाग ने अपनी इच्छा व्यक्त की कि उनकी बुद्धि सदा धर्म, मनोनिग्रह और तपस्या में लगी रहे। ब्रह्माजी ने उनकी दृढ़ साधना और इंद्रियसंयम देखकर प्रसन्न होकर कहा कि अब प्रजाके हित के लिए यह कार्य करें जिसे मैं बताने जा रहा हूं।

ब्रह्माजी ने निर्देश दिया कि पर्वत, वन, सागर, ग्राम, विहार और नगरों सहित समूची पृथ्वी हिलती-डुलती रहती है। शेषनाग इसे भलीभाँति धारण करें ताकि यह पूर्णतः अचल हो जाए। शेषनाग ने कहा कि जैसे ब्रह्माजी आज्ञा दें, वे उसी प्रकार पृथ्वी को धारण करेंगे। ब्रह्माजी ने उन्हें कहा कि पृथ्वी के नीचे जाएँ, यह स्वयं उन्हें मार्ग देगी। इसके बाद शेषनाग ने समुद्र से घिरी वसुधा-देवी को अपने अनंत फणों से पकड़कर सिर पर धारण कर लिया। तभी से पृथ्वी स्थिर हो गई।

ब्रह्माजी ने कहा कि शेषनाग धर्म के अनुरूप इस पृथ्वी को उसी प्रकार धारण करते हैं जैसे वे अथवा इन्द्र करते। शेषनाग ने ब्रह्माजी की आज्ञा का पालन करते हुए भूमिके नीचे पाताल-लोक में निवास किया। इसके बाद देवताओं में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने शेषनाग के लिए विनतानंदन गरुड को सहायक बना दिया। शेषनाग के चले जाने पर अन्य नागों ने महाबली वासुकि के पद पर उसी प्रकार अभिषेक किया जैसे देवताओं ने इन्द्र के देवराज पद पर किया।

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डिस्क्लेमर: “यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।