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Sheetala Shashthi 2019: पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है शीतला षष्ठी व्रत, जानें पूजा-विधि और व्रत कथा

Sheetala shashthi: शीतला षष्ठी व्रत माघ शुक्ल षष्ठी के दिन की जाती है। इस बार यह व्रत 11 फरवरी (सोमवार) 2019 को मनाई जाएगी।

Author नई दिल्ली | February 11, 2019 7:48 AM
शीतला माता।

Sheetala shashthi: शीतला षष्ठी व्रत माघ शुक्ल षष्ठी को किया जाता है। यह व्रत 11 फरवरी (सोमवार) 2019 को मनाया जा रहा है। शीतला षष्ठी व्रत का पालन महिलाएं करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से दैहिक और दैविक ताप से मुक्ति मिलती है। साथ ही यह व्रत पुत्र प्रदान करने वाला और सौभाग्य देने वाला होता है। कहते हैं कि महिलाएं पुत्र प्राप्ति की ईच्छा रखती हैं उनके लिए ये व्रत उत्तम कहा गया है। साथ ही इस व्रत को करने से मन शीतल रहता है। इसके अलावा चेचक से भी मुक्ति मिलती है। आगे जानते हैं शीतला षष्ठी व्रत की पूजा विधि और कथा।

विधि: शीतला षष्ठी व्रत के दिन व्रत रखने वालों को जल्दी उठाना चाहिए। इसके बाद नहा-धोकर शीतला माता की पूजा करें। इस दिन गर्म खाद्य-पदार्थ का सेवन नहीं किया जाता है। साथ ही गर्म पानी से स्नान करना भी वर्जित है। इसलिए इसका ध्यान रखें। शीतला षष्ठी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। इस दिन चूल्हे का पूजन किया जाता है। पूजा के लिए सभी नैवेद्य या भोग एक दिन पहले ही बना लेना चाहिए। लकड़ी के पटरे या चौकी परसफेद वस्त्र बिछाकर, उस पर शीतला माता की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। फिर खुद आसन पर बैठ जाएं। इसके बाद “श्रीं शीतलायै नमः, इहागच्छ इह तिष्ठ” इस मंत्र से जल अर्पित करें। फिर हाथ में वस्त्र अथवा मौली लेकर आसन के रूप में माता को अर्पित करें।

फिर शीतला माता के चरणों को धोने के लिए जल अर्पित करें। तब फिर आचमन करने के लिए जल अर्पित करें। अब स्नान लिए जल अर्पित करें। वस्त्र मंत्र के साथ वस्त्र अर्पित करें। इदं वस्त्र समर्पयामि, ॐ श्रीं शीतलायै नमः इस मंत्र से शीतला माता को वस्त्र अर्पित करें। फिर इसके बाद चंदन और अक्षत का तिलक अर्पित करें। फिर पुष्प और पुष्पमाला अर्पित करें। इसके बाद शीतला माता को धूप-दीप दिखाएं। भोग में जो बासा कल रात बनाया हो उस भोजन का भोग अर्पित करें। इसके बाद शीतला षष्ठी व्रत की कथा सुनें-सुनाएं। कथा के बाद शीतला माता की आरती करें। पूजा के बाद दोनों हाथ जोड़कर शीतला माता से क्षमा प्रार्थना करते हुए कहें-आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥ मन्त्रहीन क्रियाहींन भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥

व्रत कथा: प्राचीन समय की बात है। भारत के किसी गांव में एक बुढ़िया माई रहती थी। वह हर शीतला षष्ठी के दिन शीतला माता को ठंडे पकवानों का भोग लगाती थी। भोग लगाने के बाद ही वह प्रसाद ग्रहण करती थी। गांव में और कोई व्यक्ति शीतला माता का पूजन नहीं करता था। एक दिन गांव में आग लग गई। काफी देर बाद जब आग शांत हुई तो लोगों ने देखा, सबके घर जल गए लेकिन बुढ़िया माई का घर सुरक्षित है। यह देखकर सब लोग उसके घर गए और पूछने लगे, माई ये चमत्कार कैसे हुआ? सबके घर जल गए लेकिन तुम्हारा घर सुरक्षित कैसे बच गया?

बुढ़िया माई बोली, मैं बास्योड़ा के दिन शीतला माता को ठंडे पकवानों का भोग लगाती हूं और उसके बाद ही भोजन ग्रहण करती हूं। माता के प्रताप से ही मेरा घर सुरक्षित बच गया। गांव के लोग शीतला माता की यह अद्भुत कृपा देखकर चकित रह गए। बुढ़िया माई ने उन्हें बताया कि हर साल शीतला षष्ठी के दिन मां शीतला का विधिवत पूजन करना चाहिए, उन्हें ठंडे पकवानों का भोग लगाना चाहिए और पूजन के बाद प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। पूरी बात सुनकर लोगों ने भी निश्चय किया कि वे हर शीतला षष्ठी पर मां शीतला का पूजन करेंगे, उन्हें ठंडे पकवानों का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करेंगे।

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