Sheetala Ashtami 2026 Vrat Katha (शीतला अष्टमी व्रत कथा) Basoda Vrat Katha: हिंदू धर्म में शीतला माता को आरोग्य और स्वच्छता की देवी कहा जाता है। हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि को शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का व्रत रखा जाता है। कई लोग होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार या फिर शुक्रवार को इस व्रत को रखते हैं। इस दिन मां शीतला की विधिवत पूजा करके संतान के सुख-शांति, उज्जवल भविष्य से लेकर आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। शीतला अष्टमी यानी बसोड़ा से एक दिन पहले सप्तमी तिथि को माता के लिए गन्ने के रस और चावल से बनी खीर बनाई जाती है जिसका अष्टमी तिथि को भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि शीतला अष्टमी या बासोड़ा के दिन माता शीतला को बासी खाने का भोग लगाने के साथ इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए। ऐसा करने से त्वचा संबंधित रोगों से राहत मिलती है। इस दिन मां शीतला की विधिवत पूजा करने के साथ इस व्रत कथा का पाठ भी अवश्य करना चाहिए। आइए जानते हैं शीतला अष्टमी की कथा…
शीतला अष्टमी 2026 कब है? (Sheetala Ashtami 2026 Date)
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि प्रारम्भ – मार्च 11, 2026 को 01:54 ए एम बजे
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त – मार्च 12, 2026 को 04:19 ए एम बजे
शीतला अष्टमी तिथि- 11 मार्च 2026
शीतला अष्टमी का पूजा मुहूर्त (Sheetala Ashtami 2026 Date)
द्रिक पंचांग के अनुसार, शीतला अष्टमी पूजा मुहूर्त सुबह 06:36 ए एम से 06:27 पी एम तक है।
शीतला माता की कथा (Sheetla Mata Ki Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार बूढ़ी औरत और उसकी दो बहुओं ने शीतला माता का व्रत रखा। मान्यता के मुताबिक इस व्रत में बासी चावल चढ़ाए और खाए जाते हैं। लेकिन दोनों बहुओं ने सुबह ताज़ा खाना बना लिया, क्योंकि हाल ही में दोनों की संताने हुई थीं, इस वजह से दोनों को डर था कि बासी खाना उन्हें नुकसान ना पहुंचाए। सास को ताज़े खाने के बारे में पता चला तो वो बहुत नाराज़ हुई। कुछ क्षण ही गुज़रे थे, कि पता चला कि दोनों बहुओं की संतानों की अचानक मृत्यु हो गई। इस बात को जान सास ने दोनों बहुओं को घर से बाहर निकाल दिया।
शवों को लेकर दोनों बहुएं घर से निकल गईं। बीच रास्ते वो विश्राम के लिए रूकीं। तभी वहां पर उनके दो बहनें बैठी मिली। दोनों बहनों का नाम ओरी और शीतला था। ये दोनों बहनें अपने सिर में जूं से परेशान थी। जब उन दोनों बहुओं ने ओरी और शीतला को देखा, तो उन पर दया आई और वो दोनों के सिर को साफ करने लगीं। कुछ देर बाद दोनों बहनों को आराम मिला। ओरी और शीतला ने प्रसन्न होकर दोनों बहुओं को पुत्रवती का आशीर्वाद दिया।
ये बात सुन दोनों बुरी तरह रोने लगीं और उन्होंने महिला को अपने बच्चों के शव दिखाए और अपनी व्यथा बता दी। ये सब देख शीतला ने दोनों से कहा कि उन्हें उनके कर्मों का फल मिला है। ये बात सुन वो समझ गईं कि शीतला अष्टमी के दिन ताज़ा खाना बनाने की वजह से ऐसा हुआ।
ये सब जान दोनों ने माता शीतला से माफी मांगी और आगे से ऐसा ना करने को कहा। इसके बाद माता ने दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों बहुएं प्रसन्नता के साथ अपने घर वापस लौट आईं और हर साल विधि पूर्वक मां शीतला की पूजा-अर्चना करने लगी। इसके साथ ही इस दिन के बाद से पूरे गांव में शीतला माता का व्रत धूमधाम से मनाए जाने लगा।
डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।
