Shani Jayanti 2026 Katha: हिंदू शास्त्रों में शनि को क्रूर के साथ न्याय के देवता कहा जाता है। स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण सहित कई अन्य ग्रंथों में शनिदेव के जन्म और उन्हें मिले ‘न्यायाधीश’ के पद की एक बेहद ज्ञानवर्धक कथा मिलती है। शास्त्रों के अनुसार शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ अमावस्या के दिन हुआ था। इसी कारण इस दिन को शनि जयंती के रूप में मनाते हैं। इस साल शनि जयंती 16 मई 2026, शनिवार को मनाई ज रही है। शनिवार के दिन होने के कारण शनि जयंती का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। इस दिन शनिदेव की विधिवत पूजा करने के साथ व्रत रखते हैं। इसके अलावा उनके जन्म की कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है। आइए जानते हैं शनि जयंती की कथा…

शनि जयंती, जानें कैसे करें शनिदेव की पूजा, शुभ मुहूर्त और आरती

शनि जयंती 2026 तिथि (Shani Jayanti 2026 Date)

द्रिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 16 मई 2026 को सुबह 05 बजकर 11 मिनट से शुरू होगी, जो 17 मई को देर रात 01 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में उदया तिथि के हिसाब से शनि जयंती 16 मई 2026, शनिवार के दिन मनाई जाएगी।

शनिदेव के जन्म की कथा (Shani Jayanti 2026 Vrat Katha)

शनिदेव के जन्म की कथा स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण सहित कई अन्य ग्रंथों में भी मिलती है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देवता के साथ हुआ था। सूर्यदेव का तेज बहुत अधिक था, जिसके कारण संज्ञा हमेशा परेशान रहती थी। वो सूर्य की अग्नि को कम करना चाहती थीं। कुछ समय बाद संज्ञा और सूर्य के तीन संताने उत्पन्न हुई, दो वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना। संतान के जन्म के बाद भी संज्ञा सूर्य के तेज को कम करने का उपाय सोचती रहती थी। अंत में उन्हें एक उपाय आया और उन्होनें एक दिन अपनी हमशक्ल को बनाया और उसका नाम सवर्णा यानी छाया रखा। संज्ञा ने अपने बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी संवर्णा को सौंप दी और खुद अपने पिता के घर चली गई। वहां उनके पिता ने उन्हें वापस भेज दिया। लेकिन वो एक जंगल में जाकर घोड़ी का रुप लेकर तपस्या में लीन हो गई।

सूर्यदेव को कभी संवर्णा पर शक नहीं हुआ क्योंकि वो संज्ञा की छाया ही थी। संवर्णा को छाया रुप होने के कारण सूर्यदेव के तेज से कभी कोई परेशानी नहीं हुई। सूर्यदेव और संवर्णा के मिलन से मनु, शनिदेव और भद्रा का जन्म हुआ। कहा जाता है कि जब शनि के गर्भ से छाया गर्भवती थी, तो उन्होंने भगवान शिव की आराधना करने के साथ-साथ कठोर तपस्या की। तपस्या के समय उन्होंने अपने भोजन, आराम से लेकर अन्य सांसारिक सुखों को भी त्याग दिया। मान्यता है कि इस कठोर तप, धूप और योग-अनुष्ठान के प्रभाव से गर्भ में पल रहे शिशु का वर्ण अत्यंत श्याम हो गया और जन्म के समय उनाका रंग बिल्कुल काला था।

एक बार की बात करें कि जब शनिदेव से पहली बार अपने पति सूर्य पर दृष्टि डाली, तो उवका भी तेज कुछ क्षीण हो गया और उन्हें क्रोध आया और उसे अपना पुत्र मानने से इंकार दिया।  जब सूर्य देव का क्रोध बढ़ता गया, तो शिव जी स्वयं प्रकट होकर उन्हें बताया कि ये बालक अत्यंत तपस्वी, न्यायप्रिय और कर्मफल देने वाला देवता बनेगा। तब सूर्यदेव ने शनिदेव को स्वीकार किया।

भगवान शिव से शनिदेव को न्यायाधीश का पद देने के साथ नवग्रह में विशेष स्थान दिया। इसके साथ ही शनिदेव जातकों को उनके कर्मों के हिसाब से फल देते हैं।

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डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।