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यहीं औरंगजेब ने करवाई थी गुरु तेगबहादुर की हत्या, जानें शीशगंज गुरुद्वारा का इतिहास

दिल्ली के इसी स्थान पर गुरु तेग बहादुर का सिर काट दिया गया था, क्योंकि उन्होनें इस्लाम अपनाने से इंकार कर दिया था। इसी कारण से उन्हें 'हिंद दी चादर' भी कहा जाता है।

8 महीने के समय के बाद 1783 में गरुद्वारा बना।

गुरु तेग बहादुर सिखों के नौवें गुरु को समर्पित दिल्ली के चांदनी चौक का गुरुद्वारा शीशगंज गुरुद्वारा साहिब के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण की नींव बघेल सिंह ने 1783 में डाली थी। इसी जगह पर मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर गुरु तेग बहादुर का सिर काट दिया गया था। उस समय कई लोग ने औरंगजेब के खौफ में अपना धर्म परिवर्तित किया था। औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को भी धर्म परिवर्तन का आदेश दिया था, लेकिन सिखों के गुरु ने इस आदेश को नहीं माना और 11 नवंबर 1675 को इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए मना कर दिया। इसी स्थान पर शीशगंज गुरुद्वारा गुरुद्वारा बनाया गया।

औरंगजेब के आदेश से गुरु तेग बहादुर का सिर काट दिया गया और उसके बाद शहीद गुरु तेग बहादुर का पार्थिव शरीर अनुयायियों के दर्शन के लिए रखा जाता उससे पहले ही उनके एक अनुयायी लखी शाह वंजारा ने चुरा लिया और गुरु जी के शरीर का संस्कार करने के लिए अपना घर तक जला दिया और उस जगह पर रकाब गंज साहिब गुरुद्वारा स्थापित हुआ। गुरु तेग बहादुर का शीश आनंदपुर साहिब लेकर उनके अनुयायी भाई जैटा पहुंचे और शीश के संस्कार से पहले उसे एक रात के लिए तरोरी ले जाया गया और उस स्थान पर शीश गंज साहिब नाम से तारोरी, करनाल में गुरुद्वारा बनाया गया। इसके बाद गोविंद राय सिखों के दसवें गुरु बने।

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11 मार्च 1783 में सिख मिलट्री के लीडर बघेल सिंह(1730-1802) अपनी सेना के साथ दिल्ली आए। वहां उन्होनें दिवान-ए-आम पर कब्जा कर लिया। इसके बाद मुगल बादशाह शाह अलाम द्वितीय ने सिखों के एतिहासिक स्थान पर गुरुद्वारा बनाने की बात मान ली और उन्हें गुरुद्वारा बनाने के लिए रकम दी। 8 महीने के समय के बाद 1783 में शीश गंज गुरुद्वारा बना। इसके बाद कई बार मुस्लिमों और सिखों में इस बात का झगड़ा रहा कि इस स्थान पर किसका अधिकार है। लेकिन ब्रिटिश राज ने सिखों के पक्ष में निर्णय दिया। गुरुद्वारा शीश गंज 1930 में पुर्नव्यवस्थित हुआ।

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