ताज़ा खबर
 

सावन की तीसरी सोमवारी को 2 लाख कांवड़ियों ने बाबा वैद्यनाथ का जलाभिषेक किया

शिविर में कांवड़ियों की थकान मिटाने के लिए भजन कीर्तन मंडली बाबा भोलेनाथ के भजन सुनाती रहती है।

इस तस्वीर का इस्तेमाल सांकेतिक तौर पर किया गया है।

सावन के तीसरे सोमवार को करीबन 2 लाख श्रद्धालुओं ने द्वादश ज्योतिर्लिंग बाबा वैद्यनाथ का जलाभिषेक किया। देवघर जिला प्रशासन के मुताबिक अबतक तकरीबन 18 लाख कांवड़िए बाबा वैद्यनाथ का दर्शन पूजा कर चुके है और करीब एक करोड़ रूपए बतौर चढ़ावा मंदिर की आमदनी हो चुकी है। सुलतानगंज से देवघर गेरुआ वस्त्र पहने कांवड़ियों का जन सैलाव उमड़ पड़ा है। यदि आपको सेवा भावना देखनी हो तो 105 किलोमीटर कांवड़िए रास्ते पर आइए। दर्जनों संस्थाएं अपना कैंप लगा लगातार एक महीने भोलेनाथ के भक्तों की सेवा करने में जुटे है। मसलन इनकी सेवा बेमिसाल है।

कांवड़ियों को सहारा देने से लेकर दवा , भोजन , विश्राम का इंतजाम इन शिविरों में है। इतना ही नहीं देवघर में तो राजनैतिक दलों के भी सेवा शिविर दिखे। जिनमें राजद का कैंप तो घंटाघर चौक पर ही लगा है। पार्टी के प्रदेश नेता संजय भारद्वाज बताते है कि सालों से यह शिविर लगा कांवड़ियों की सेवा करते आ रहे है। कांग्रेस और भाजपा का भी शिविर लगा है। मारवाड़ी युवा मंच , असम- बंगाल सेवा शिविर , बेगूसराय कांवड़िया सेवा कैंप , छतीसगढ़ निःशुल्क सेवा शिविर, बाबा वासुकीनाथ सेवा संघ, देवराहा बाबा सेवा संघ , मानव सेवा संघ, भागलपुर कांवड़ संघ बगैरह दर्जनों संस्थाएं निःस्वार्थ सेवा भावना से लगी है। असल में ये पुण्य कमाते है।

इनके मुकाबले सरकारी बंदोबस्त सिर्फ दिखावा है। सावन में आने वाले कांवड़िए सरकारी खजाने में इजाफे के साधन है और सरकारी नुमाइंदे स्वयंसेव्वी संगठनों के लिए सिरदर्द। यों भी साल दर साल बढ़ती श्रद्धलुओं की तादाद के मद्देनजर पूरी व्यवस्था संभालना प्रशासन के बूते के बाहर है। हांलाकि हरेक साल उद्घाटन के रोज राष्ट्रीय मेला घोषित कर पर्यटक नक़्शे पर लाने की बात उठती है। लेकिन धरातल पर नहीं उतरती।

कांवड़िया रास्ते सुलतानगंज से देवघर और बासुकीनाथ करीब दो सौ किलोमीटर का इस संबाददाता ने मुआयना किया। सड़क किनारे स्वयंसेवी संस्थाओं के सड़क किनारे बने शिविर ही कांवड़ियों के पड़ाव का मुख्य केंद्र है। कांवड़ियों का जत्था इन शिविरों में विश्राम कर बाबा धाम की ओर बढ़ते है। शिविर वालों को महीने भर तक दम मारने की फुर्सत नहीं होती। रात दिन स्वयं सेवक लगे है। कोई किसी कांवड़िए के पैर में निकले छाले की मरहम पट्टी कर रहा है तो कोई गुनगुने पानी से उनके पैरों को धोने में लगा है। दूसरी ओर भोजन करने वालों की पंगत बैठी है।

शिविर में कांवड़ियों की थकान मिटाने के लिए भजन कीर्तन मंडली बाबा भोलेनाथ के भजन सुनाती रहती है। खासकर रात्रि विश्राम के वक्त कांवड़िए मंत्रमुग्ध हो सुनते है। कलकत्ता , असम , छतीसगढ़ बगैरह शिविरों में स्वयंसेवक ऐसे है जिनके घरों में इनकी सेवा में नॉकरों और मुनीम की फौज है। ऐसे उदारमना लोगों की बदौलत ये शिविर चल रहे है। मगर प्रशासन का इन्हें खुले दिल से सहयोग नहीं है।

चौकसी में लगे पुलिस गश्ती दल या थाना स्तर के लोग भी शिविर में भोजन करने धमक जाते है। स्वास्थ्य महकमा गंदगी का तुर्रा छोड़ पैसे ऐंठने में लगा है। जबकि सरकारी शिविरों की तुलना में इनके शिविर की सफाई कई गुना बेहतर है। शिविरों में स्वच्छ और शुद्ध भोजन मुफ्त में कराने के सबसे बड़े दुश्मन स्थानीय होटल वाले है। किसी न किसी तरह का सरकारी अड़ंगा दस्तूरी के बल पर लगा इन शिविरों को बंद कराने की साजिश रचते रहते है।

बाबजूद इसके ये स्वयंसेवी संगठन अपनी सच्ची सेवा भावना से लगे है। और कांवड़िए इनका दिल से आभार जता अपनी अटूट आस्था के साथ बाबा धाम कूच कर रहे है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App