दिव्य धाम की सीरीज में आज हम बात करने जा रहे हैं राजस्थान प्रदेश के चुरू जिले में स्थित सालासार बालाजी धाम के बारे में, सालासर बालाजी धाम देश के सबसे प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में से एक माना जाता है। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान हनुमान के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। सालासर धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां विराजमान बालाजी महाराज की प्रतिमा दाढ़ी और मूंछ के साथ दिखाई देती है, जो भारत में बेहद दुर्लभ मानी जाती है। यही कारण है कि यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

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सालासर बालाजी मंदिर का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार सालासर बालाजी अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। मंदिर परिसर में स्थित पवित्र वृक्ष पर नारियल और लाल धागा बांधने की परंपरा भी काफी प्रसिद्ध है। श्रद्धालु अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए यहां नारियल अर्पित करते हैं। चैत्र पूर्णिमा (हनुमान जयंती) और शरद पूर्णिमा के अवसर पर यहां विशाल मेलों का आयोजन होता है, जिसमें देशभर से लाखों भक्त शामिल होते हैं।

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सालासर बालाजी मंदिर का इतिहास

सालासर बालाजी मंदिर का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि नागौर जिले के असोटा गांव में एक किसान को खेत जोतते समय भगवान हनुमान की प्रतिमा प्राप्त हुई थी। उसी समय असोटा के ठाकुर और सालासर के संत बाबा मोहनदास को स्वप्न में बालाजी महाराज ने प्रतिमा को सालासर ले जाकर स्थापित करने का आदेश दिया। इसके बाद प्रतिमा को सालासर लाया गया औरलगभग 1755 ई. में इसकी स्थापना की गई। बाद में वर्ष 1759 में मंदिर का निर्माण कराया गया।

दाढ़ी-मूंछ वाले हनुमान जी की प्रतिमा का रहस्य

सालासर बालाजी मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां हनुमान जी की प्रतिमा दाढ़ी और मूंछ के साथ विराजमान है। मान्यता है कि भक्तों को स्वप्न में बालाजी महाराज इसी स्वरूप में दिखाई दिए थे, जिसके बाद उसी रूप में उनकी स्थापना की गई। यही वजह है कि यह मंदिर देशभर में विशेष पहचान रखता है।

सालासर बालाजी कैसे पहुंचें

सालासर धाम जयपुर-बीकानेर राजमार्ग पर स्थित है। साथ ही सालासर का निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन सुजानगढ़ है, जो मंदिर से लगभग 25-30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। स्टेशन से टैक्सी और बस आसानी से मिल जाती है। वहीं सबसे पास हवाई अड्डा जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्टहै, जो सालासर से लगभग 170 किलोमीटर दूर है।

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डिसक्लेमर- यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। लेख में वर्णित इतिहास, मान्यताएं और धार्मिक महत्व श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े विषय हैं, जिनकी पुष्टि वैज्ञानिक या ऐतिहासिक दृष्टि से आवश्यक रूप से नहीं की जा सकती। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, यात्रा या मान्यता का पालन अपनी श्रद्धा और विवेक के अनुसार करें। इस सामग्री का उद्देश्य केवल जानकारी प्रदान करना है।