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Sankashti Chaturthi: आज है संकष्टी चतु्र्थी, जानिये शुभ मुहूर्त और पूजा विधि; सुनें ये व्रत कथा, होगी गणपति की कृपा

माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि यानि आज 21 जनवरी, 2022 दिन शुक्रवार को संकष्टी चौथ का व्रत रखा जाएगा।

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संकष्टी चतुर्थी 2022: संकष्टी चतुर्थी का मतलब होता है संकट को हरने वाली चतुर्थी (Photo- Pixabay)

हिंदू मान्यताओं में सभी त्यौहारों का अपना-अपना महत्व है। हर त्यौहार किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होता है। आज (21 जनवरी) को संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi) है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रीगणेश की पूजा करने से सभी संकट दूर हो जाते हैं। जानिए पूजा विधि, महत्व, कथा और सभी जरूरी जानकारी…

संकष्टी चतुर्थी का मुहूर्त और चंद्रोदय समय: संकष्टी चतुर्थी शुक्रवार 21 जनवरी को सुबह 8 बजकर 52 मिनट तक तृतीया तिथि है। इसके बाद ही चतुर्थी लग रही है लेकिन इसी दिन 9 बजकर 43 मिनट के बाद पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र प्रभाव में आएगा। जबकि राहुकाल 10 बजकर 30 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजे तक रहेगा। इसलिए पूजन के लिए शुभ समय 9 बजकर 43 मिनट से 10 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। वहीं, चंद्रोदय रात 8 बजकर 3 मिनट पर दिल्ली में इस दिन चंद्रदर्शन का समय रहेगा जबकि मुंबई में 8 बजकर 27 मिनट पर चंद्रदर्शन किया जा सकेगा।

पूजा विधि: संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए। जल में तिल मिलाकर अर्घ्य देना चाहिए। इस दिन व्रत रखने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। शाम के समय गणेश जी की विधिवत पूजा करनी चाहिए। इसके बाद भगवान को दूब अर्पित करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा करने से धन-सम्मान में वृद्धि होती है। मान्यता है कि इस दिन जमीन के अंदर होने वाले फलों और सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए। जैसे-आलू, मूली प्याज या चुकंदर। ऐसा करने से भगवान गणेश नाराज होते हैं।

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार जो सबसे ज्यादा प्रचलित कथा है, हम आपको वह कथा बताने जा रहे हैं। एक बार माता पार्वती और भगवान शिव नदी के पास बैठे हुए थे तभी अचानक माता पार्वती ने चौपड़ खेलने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की। लेकिन वहां उन दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं था जो खेल में निर्णायक की भूमिका निभाए। इस समस्या का समाधान निकालते हुए शिव और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें जान डाल दी। मिट्टी से बने बालक को दोनों ने यह आदेश दिया कि तुम खेल को अच्छी तरह से देखना और यह फैसला लेना कि कौन जीता और कौन हारा। खेल शुरू हुआ जिसमें माता पार्वती बार-बार भगवान शिव को मात दे कर विजयी हो रही थीं।

खेल चलते रहा लेकिन एक बार गलती से बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। बालक की इस गलती ने माता पार्वती को बहुत क्रोधित कर दिया जिसकी वजह से गुस्से में आकर बालक को श्राप दे दिया और वह लंगड़ा हो गया। बालक ने अपनी भूल के लिए माता से बहुत क्षमा मांगे और उसे माफ़ कर देने को कहा। बालक के बार-बार निवेदन को देखते हुए माता ने कहा कि अब श्राप वापस तो नहीं हो सकता लेकिन वह एक उपाय बता सकती हैं जिससे वह श्राप से मुक्ति पा सकेगा। माता ने कहा कि संकष्टी वाले दिन पूजा करने इस जगह पर कुछ कन्याएं आती हैं, तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को सच्चे मन से करना।

बालक ने व्रत की विधि को जान कर पूरी श्रद्धापूर्वक और विधि अनुसार उसे किया। उसकी सच्ची आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उसकी इच्छा पूछी। बालक ने माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की अपनी इच्छा को ज़ाहिर किया। गणेश ने उस बालक की मांग को पूरा कर दिया और उसे शिवलोक पंहुचा दिया, लेकिन जब वह पहुंचा तो वहां उसे केवल भगवान शिव ही मिले। माता पार्वती भगवान शिव से नाराज़ होकर कैलाश छोड़कर चली गयी होती हैं। जब शिव ने उस बच्चे को पूछा की तुम यहाँ कैसे आए तो उसने उन्हें बताया कि गणेश की पूजा से उसे यह वरदान प्राप्त हुआ है। यह जानने के बाद भगवान शिव ने भी पार्वती को मनाने के लिए उस व्रत को किया जिसके बाद माता पार्वती भगवान शिव से प्रसन्न हो कर वापस कैलाश लौट आती हैं। इस कथा के अनुसार संकष्टी के दिन भगवान गणेश का व्रत करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है।

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