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जीवन ऐसा मत बनाओ जैसे वाई-फाई की रेंज में हो डिवाइस और पासवर्ड पता न हो

यदि तुम्हें ऐसा महापुरुष मिले जो ऊपर के रहस्य जानता हो, ऊपर जाता आता हो और तुम्हारा परिचय तुम्हारे से करा दे, ऊपर की ध्वनियों से करा दे तो काम हो जाए, बात बन जाए।

यदि प्रभु और सदगुरु की प्रेरणा से तुम्हें नाम ध्वनि का रस आने लगे तो तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा आरम्भ हो जाए।

तुम्हारा मन तुम्हें बरगला कर तुम्हें असली खजाने को पाने की राह में अड़चन डाल कर इस संसार के पत्थरों और धूल-मिट्टी में बहलाए रखता है, जो तुम्हारी हैं ही नहीं। वो तुम्हें इन चमकते कंकड़-पत्थर को दौलत का आभास दिलाता है। तुम दफ्तर जाना, धन कमाना, भोजन करना, वस्त्र धारण करना, स्त्री-पुरुष, पति-पत्नी, बेटे बेटी, झूठी पद प्रतिष्ठा और तरक्की, मान और अपमान, जमीन-जायदाद और क्षणिक काम-वासना जैसी अर्थहीन गतिविधियों से इस कद्र जुड़ गए कि अपने अंदर जाकर उन शब्दों को सुनना ही भूल गए, जो तुम्हारा आधार हैं, मूल है।

इसीलिए तुम्हें अन्तर के शब्द, वेद वाणी, अनहद ध्वनि, आकाशवाणी, खुदा की आसमानी आवाज सुनाई नहीं देती है। वो पल-पल बह रही हैं तुम्हारे इर्द गिर्द, बज रही हैं, थिरक रही हैं, खनक रही हैं, फिर भी तुम्हे सुनाई नहीं दे रही हैं। वो तुम्हें लपेटे हुए है पर तुम्हें पता नहीं। तुम उन्हें नहीं जानते। जैसे वाई-फाई की वेव तुम्हारे डिवाइस के चारों ओर घूम रही हो और तुम्हें पासवर्ड पता न हो तो वो उन लहरों के मध्य रहकर भी कनेक्ट न हो सकेगा। यदि तुम्हें ऐसा महापुरुष मिले जो ऊपर के रहस्य जानता हो, ऊपर जाता आता हो, जो तकनीक जानता हो, वो तुम्हारा ध्यान संसार से उलटकर अनहद की नाम ध्वनि से जोड़ सके और तुम्हारा परिचय तुम्हारे से करा दे, ऊपर की ध्वनियों से करा दे तो काम हो जाए, बात बन जाए। यदि प्रभु और सदगुरु की प्रेरणा से तुम्हें नाम ध्वनि का रस आने लगे, तुम्हें दोनों आंखों के सामने एक बिंदु, यानि तीसरे तिल का परिचय हो जाये तो तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा आरम्भ हो जाए।

तो तुम भी उस महा शब्द से कनेक्ट हो जाओ। तीसरा तिल वो है जहां से तुम इस जगत से आगे की यात्रा आरम्भ करते हो, इस कायनात से आगे की कायनात की ओर उन्मुख होते हो। वो बिन्दु तत्काल दिखाई नहीं देता। तुरंत नजर नहीं आता और जब दिखता भी है तो तुरंत स्थिर नहीं होता। चंचलता का आभास होता रहता है। वो भागता हुआ या घूमता हुआ प्रतीत होता है। वो तो स्थिर है, रुका हुआ है। पर मन उसे अस्थिर महसूस कराता है। वो बिंदु पहले सूक्ष्म और स्याह यानि काला दिखता है। पर रफ्ता-रफ्ता सुर्ख और श्वेत और उसके बाद विराट और महाविराट हो जाता है। वो द्वार यानि तीसरा तिल तुम्हे सदगुरु की कृपा के बगैर ना मिल सकेगा।

सदगुरु से अन्दर का रहस्य जानकर, भेद लेकर, युक्ति यानि तकनीक सीख कर यदि तुम अपना रूहानी सफर शुरू कर दो तो तुम स्वयं में उतर कर गुरु के द्वारा अपने मूल को खुद को उपलब्ध हो जाओगे। सदगुरु के सदृश हो जाओगे।

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