अहंकार, जिसे हम आम बोलचाल की भाषा में घमंड या आत्म-महत्त्व भी कहते हैं। ये व्यक्ति के अंदर एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो अक्सर, अदिक सम्मान, आत्म विश्वास तो बढ़ाती है। लेकिन जब ये सब एक मात्रा से ज्यादा हो जाते हैं, तो व्यक्ति के निर्णय और व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डालने लगती है। जो आगे चलकर अहंकार का रूप ले लेता है। इतिहास से लेकर हमारे ग्रंथों में लिखी कई पौराणिक कथाओं में ये अक्सर देखा गया है कि अहंकार ने महान व्यक्तियों और देवताओं को भी संकट में डाल दिया। ऐसी ही एक पौराणिक कथा विष्णु पुराण में लिखी है जिसमें देवताओं के राजा इंद्रदेव के ऊपर सत्ता, वैभव का घमंड इतना ज्यादा हुआ गया था कि उन्होंने ऋषि दुर्वासा का अपमान कर दिया था और उन्हें उनके भयानक शाप का सामना करना पड़ा था।

विष्णु पुराण के प्रथम अंश के अध्याय नौ में इस पौराणिक कथा के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस कथा को श्री पराशर जी ने सुनाई है। स्वर्ग के राजा इंद्रदेव की अहंकारपूर्ण गलती ने उन्हें संकट में डाल दिया। उनकी शक्ति, वैभव से लेकर प्रतिष्ठा तक नष्ट हो जाने से लेकर स्वर्ग तक छिन गया था।

ऋषि दुर्वासा के इस शाप से देवताओं से छीन गया था स्वर्ग

पौराणिक कथा के अनुसार, श्रीपराशर जी बोले कि हे मैत्रेय ! तुमने इस समय मुझसे जिसके विषय में पूछा है वह श्रीसम्बन्ध (लक्ष्मीजीका इतिहास) मैंने भी मरीचि ऋषि से सुना था, वह मैं तुम्हें सुनाता हूं। सुनो । एक बार शंकरके अंशावतार श्री दुर्वासा जी पृथ्वीतल में विचर रहे थे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विद्याधरी के हाथों में सन्तानक पुष्पों की एक दिव्य माला देखी। हे ब्रह्मन् ! उसकी गन्ध से सुवासित होकर वह वन वनवासियों के लिये अति सेवनीय हो रहा था। तब उन उन्मत्त वृत्ति वाले विप्रवरने वह सुन्दर माला देखकर उसे उस विद्याधर-सुन्दरीसे मांगा। उनके मांगने पर उस बड़े-बड़े नेत्रोंवाली कृशांगी विद्याधरीने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम कर वह माला दे दी।

हे मैत्रेय! उन उन्मत्त वेषधारी विप्रवरने उसे लेकर अपने मस्तक पर डाल लिया और पृथ्वीपर विचरने लगे। इसी समय उन्होंने उन्मत्त ऐरावतपर चढ़कर देवताओंके साथ आते हुए त्रैलोक्याधिपति शचीपति इन्द्र को देखा । उन्हें देखकर मुनिवर दुर्वासा ने उन्मत्त के समान वह मतवाले भौंरों से गुंजायमान माला अपने सिर पर से उतार कर देवराज इन्द्र के ऊपर फेंक दी। देवराजने उसे लेकर ऐरावत के मस्तक पर डाल दी। उस समय वह ऐसी सुशोभित हुई मानो कैलास पर्वत के शिखर पर श्री गंगा जी विराजमान हों।

उस मदोन्मत्त हाथी ने भी उसकी गन्ध से आकर्षित हो उसे सूंड से सूंघकर पृथ्वी पर फेंक दिया। हे मैत्रेय! यह देखकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् दुर्वासा जी अति क्रोधित हुए और देवराज इन्द्र से इस प्रकार बोले।

दुर्वासाजीने कहा— अरे ऐश्वर्य के मद से दूषित चित्त इन्द्र! तू बड़ा ढीठ है, तूने मेरी दी हुई सम्पूर्ण शोभा की धाम माला का कुछ भी आदर नहीं किया। अरे ! तूने न तो प्रणाम करके ‘बड़ी कृपा की’ ऐसा ही कहा और न हर्ष से प्रसन्न वदन होकर उसे अपने सिर पर ही रखा। रे मूढ़! तूने मेरी दी हुई माला का कुछ भी मूल्य नहीं किया, इसलिए तेरा त्रिलोकी का वैभव नष्ट हो जायगा।

इन्द्र! निश्चय ही तू मुझे और ब्राह्मणों के समान ही समझता है, इसीलिये तुझ अति मानी ने हमारा इस प्रकार अपमान किया है। अच्छा, तूने मेरी दी हुई माला को पृथ्वी पर फेंका है इसलिये तेरा यह त्रिभुवन भी शीघ्र ही श्री हीन हो जायगा। रे देवराज! जिसके क्रुद्ध होनेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् भयभीत हो जाता है उस मेरा ही तूने अति गर्व से इस प्रकार अपमान किया।

श्रीपराशर जी बोले— तब तो इन्द्र ने तुरन्त ही ऐरावत हाथी से उतरकर निष्पाप मुनिवर दुर्वासाजी को विनय करके प्रसन्न किया। तब उसके प्रणामादि करने से प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा जी उससे इस प्रकार कहने लगे।

दुर्वासाजी बोले— इन्द्र! मैं कृपालु-चित्त नहीं हूं, मेरे अन्तःकरण में क्षमा को स्थान नहीं है। वे मुनिजन तो और ही हैं; तुम समझो, मैं तो दुर्वासा हूं न? गौतमादि अन्य मुनिजनों ने व्यर्थ ही तुझे इतना मुंह लगा लिया है; पर याद रख, मुझ दुर्वासा का सर्वस्व तो क्षमा न करना ही है।

दयामूर्ति वसिष्ठ आदि के बढ़-बढ़कर स्तुति करने से तू इतना गर्वीला हो गया कि आज मेरा भी अपमान करने चला है। अरे! आज त्रिलोकी में ऐसा कौन है जो मेरे प्रज्वलित जटाकलाप और टेढ़ी भृकुटि को देखकर भयभीत न हो जाय?। रे शतक्रतो! तू बारम्बार अनुनय-विनय करने का ढोंग क्यों करता है? तेरे इस कहने-सुनने से क्या होगा? मैं क्षमा नहीं कर सकता।

श्रीपराशर जी बोले— हे ब्रह्मन्! इस प्रकार कह वे विप्रवर वहां से चल दिये और इन्द्र भी ऐरावत पर चढ़कर अमरावती को चले गये हे। तभी से इन्द्र के सहित तीनों लोक वृक्ष-लता आदि के क्षीण हो जाने से श्रीहीन और नष्ट-भ्रष्ट होने लगे। तब से यज्ञों का होना बन्द हो गया, तपस्वियों ने तप करना छोड़ दिया तथा लोगों का दान आदि धर्मों में चित्त नहीं रहा।

हे द्विजोत्तम! सम्पूर्ण लोक लोभादि के वशीभूत हो जाने से सामर्थ्यहीन हो गये और तुच्छ वस्तुओं के लिये भी लालायित रहने लगे। जहां सत्त्व होता है वहीं लक्ष्मी रहती है और सत्त्व भी लक्ष्मी का ही साथी है। श्रीहीनों में भला सत्त्व कहां? और बिना सत्त्व के गुण कैसे ठहर सकते हैं ?

बिना गुणों के पुरुष में बल, शौर्य आदि सभी का अभाव हो जाता है और निर्बल तथा अशक्त पुरुष सभीसे अपमानित होता है। अपमानित होने पर प्रतिष्ठित पुरुष की बुद्धि बिगड़ जाती है।

इस प्रकार त्रिलोकी के श्रीहीन और सामर्थ्यहीन हो जाने पर दैत्य और दानवों ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी। सत्त्व और वैभव से शून्य होने पर भी दैत्यों ने लोभवश निःसत्त्व और श्रीहीन देवताओं से घोर युद्ध ठाना। अन्त में दैत्यों द्वारा देवता परास्त हुए। तब इन्द्रादि समस्त देवगण अग्निदेव को आगे कर महाभाग पितामह श्री ब्रह्मा जी की शरण गये।

देवताओं से सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर श्रीब्रह्मा जी ने उनसे कहा, ‘हे देवगण! तुम दैत्य-दलन परावरेश्वर भगवान् विष्णु की शरण जाओ, जो संसार की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के कारण हैं किन्तु [वास्तवमें] कारण भी नहीं हैं और जो चराचर के ईश्वर, प्रजापतियों के स्वामी, सर्वव्यापक, अनन्त और अजेय हैं तथा जो अजन्मा किन्तु कार्यरूपमें परिणत हुए प्रधान और पुरुष के कारण हैं एवं शरणागत वत्सल हैं। [शरण जानेपर] वे अवश्य तुम्हारा मंगल करेंगे’।

श्रीपराशर जी बोले— हे मैत्रेय! सम्पूर्ण देवगणों से इस प्रकार कह लोकपितामह श्रीब्रह्मा जी भी उनके साथ क्षीरसागर के उत्तरी तट पर गये। वहां पहुंचकर पितामह ब्रह्माजी ने समस्त देवताओं के साथ पद्मनाभ श्री विष्णु भगवान की अति मंगलमय वाक्यों से स्तुति की।

ब्रह्माजी कहने लगे— जो समस्त अणुओं से भी अणु और पृथिवी आदि समस्त गुरुओं से भी गुरु हैं। उन निखिल लोक विश्राम, पृथिवी के आधार स्वरूप, अप्रकाशय, अभेद्य, सर्वरूप, सर्वेश्वर, अनन्त, अज और अव्यय नारायणको मैं नमस्कार करता हूं। मेरे सहित सम्पूर्ण जगत् जिसमें स्थित है, जिससे उत्पन्न हुआ है और जो देव सर्वभूतमय है तथा जो पर से भी पर है; जो पर पुरुष से भी पर है, मुक्ति-लाभ के लिये मोक्षकामी मुनिजन जिसका ध्यान धरते हैं तथा जिस ईश्वर में सत्त्वादि प्राकृतिक गुणों का सर्वथा अभाव है वह समस्त शुद्ध पदार्थों से भी परम शुद्ध परमात्म स्वरूप आदि पुरुष हमपर प्रसन्न हों। जिस शुद्ध स्वरूप भगवान की शक्ति कला-काष्ठा और मुहूर्त आदि काल-क्रमका विषय नहीं है, वे भगवान् विष्णु हमपर प्रसन्न हों।

जो भोक्ता और भोग्य, स्रष्टा और सृज्य तथा कर्ता और कार्यरूप स्वयं ही हैं उस परम पद को हम प्रणाम करते हैं। जो विशुद्ध बोधस्वरूप, नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यय, अव्यक्त और अविकारी है वही विष्णुका परमपद है। जो न स्थूल है न सूक्ष्म और न किसी अन्य विशेषण का विषय है वही भगवान् विष्णुका नित्य-निर्मल परमपद है, हम उसको प्रणाम करते हैं। (भगवान विष्णु की स्तुति को संक्षेप पर लिखा गया है)

श्रीपराशरजी बोले— ब्रह्माजी के इन उद्गारों को सुनकर देवगण भी प्रणाम करके बोले— ‘प्रभो ! हम पर प्रसन्न होकर हमें दर्शन दीजिये। जगद्धाम सर्वगत अच्युत ! जिसे ये भगवान् ब्रह्माजी भी नहीं जानते, आपके उस परम पद को हम प्रणाम करते हैं’।

श्रीपराशर जी बोले— हे मैत्रेय! इस प्रकार स्तुति किये जानेपर शंख-चक्रधारी भगवान् परमेश्वर उनके सम्मुख प्रकट हुए। तब उस शंख-चक्र गदाधारी उत्कृष्ट तेजोराशिमय अपूर्व दिव्य मूर्ति को देखकर पितामह आदि समस्त देवगण अति विनयपूर्वक प्रणाम कर क्षोभवश चकित-नयन हो उन कमलनयन भगवान्‌ की स्तुति करने लगे।

देवगण बोले- हे प्रभु! आपको बार-बार नमस्कार है। आप निराकार और निर्विशेष होते हुए भी ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, पवन, वरुण, सूर्य और यमराज सब कुछ आप ही हैं। हे देव! वसु, मरुद्गण, साध्यगण और विश्वेदेव भी आप ही के रूप हैं, और आपके सामने उपस्थित यह समस्त देवसमूह भी आप ही का विस्तार है, क्योंकि आप ही सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं। आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार हैं, और आप ही ओंकार तथा प्रजापति हैं। हे सर्वात्मा! विद्या, वेद और यह पूरा संसार सब आपका ही स्वरूप है।

हे विष्णु! दैत्यों से पराजित होकर हम व्याकुल अवस्था में आपकी शरण में आए हैं। हे सर्वस्वरूप प्रभु! हम पर प्रसन्न हों और अपने तेज से हमें पुनः सशक्त करें। हे प्रभो! जब तक जीव आपके शरण में नहीं आता। जो समस्त पापों का नाश करने वाले हैं तब तक वह दीनता, इच्छाओं, मोह और दुःख से घिरा रहता है। हे प्रसन्नात्मा! हम शरणागतों पर कृपा करें और हे नाथ! अपनी शक्ति से हम सभी देवताओं के खोए हुए तेज को पुनः बढ़ा दें।

श्रीपराशर जी बोले— विनीत देवताओं द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विश्वकर्ता भगवान् हरि प्रसन्न होकर इस प्रकार बोले- हे देवगण! मैं तुम्हारे तेज को फिर बढ़ाऊंगा; तुम इस समय मैं जो कुछ कहता हूं वह करो तुम दैत्यों के साथ सम्पूर्ण ओषधियां लाकर अमृत के लिये क्षीर-सागर में डालो और मन्दराचल को मथानी तथा वासुकि नागको नेती बनाकर उसे दैत्य और दानवोंके सहित मेरी सहायतासे मथकर अमृत निकालो।

तुम लोग सामनीतिका अवलम्बन कर दैत्यों से कहो कि ‘इस काम में सहायता करने से आप लोग भी इसके फल में समान भाग पायेंगे’। समुद्र के मथने पर उससे जो अमृत निकलेगा उसका पान करने से तुम सबल और अमर हो जाओगे।

हे देवगण! तुम्हारे लिये मैं ऐसी युक्ति करूंगा जिससे तुम्हारे द्वेषी दैत्यों को अमृत न मिल सकेगा और उनके हिस्से में केवल समुद्र-मन्थन का क्लेश ही आयेगा।

यह समुद्र मंथन की वह महान घटना है जिससे अंततः लक्ष्मी जी, अमृत और अन्य 14 रत्न निकले थे। इसके साथ ही देवताओं के फिर से स्वर्ग की प्राप्ति हुई। इस मंथन में निकले अमृत का पान देवताओं ने किया और पुन: राक्षसों से युद्ध करके स्वर्गलोक हासिल किया।

ये कथा हमें इंद्र का पतन ही नहीं बल्कि अहंकार, विनम्रता और कर्म का महत्व भी सिखाती है। इसलिए व्यक्ति को अपनी शक्ति, ज्ञान आदि का कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए।

डिस्क्लेमर: “यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जंसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।