UP: कन्नौज में शरद पूर्णिमा पर होता है रावण दहन, यहां छिपा है दशानन की मौत का असली राज

कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की मान्यता है कि दशहरे पर राम ने रावण को तीर मारकर धराशाई किया था लेकिन रावण ने अपने प्राण शरद पूर्णिमा वाले दिन ही त्यागे थे।

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कन्नौज में शरद पूर्णिमा पर होता है रावण दहन फोटो सोर्स- स्थानीय

देशभर मे दशहरे के मौके पर रावण दहन किया जाता है वहीं इतिहास और इत्र की नगरी कन्रौज में रावण दहन शरद पूर्णिमा के दिन किया जाता है। यहां दशहरा वाले दिन रावण दहन न होकर शरद पूर्णिमा वाले दिन रावण वध और रावण दहन का कार्यक्रम किया जाता है। इसके पीछे कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की मान्यता है कि दशहरे पर राम ने रावण को तीर मारकर धराशाई किया था लेकिन रावण ने अपने प्राण शरद पूर्णिमा वाले दिन ही त्यागे थे इस वजह से रावण का अंत शरद पूर्णिमा को ही हुआ और यही कारण है कि कन्नौज में शरद पूर्णिमा पर रावण दहन किया जाता है।

पारंपरिक तरीके से होता है रामलीला का आयोजनः कन्नौज शहर में पारंपरिक तरीके से दो स्थानों पर रामलीला का आयोजन किया जाता है पहला स्थान है ग्वाल मैदान। यहां आदर्श रामलीला के बैनर तले रामलीला का शुभारंभ सन 1880 में हुआ था। इस रामलीला में शुरुआत से ही रावण दहन शरद पूर्णिमा वाले दिन ही किया जाता है। इतिहासकार बताते हैं कि रावण ने शरद पूर्णिमा के दिन ही प्राण त्यागे थे, इस बीच उन्होंने लक्ष्मण जी को ज्ञान दिया था।
National Hindi News, 13 October 2019 LIVE Updates: देश-दुनिया की हर खबर पढ़ने के लिए यहां करें क्लिक
गणेश पूजन के बाद होती है रामलीला मंचन की शुरूआतः इसी तरह यहां दूसरा आयोजन शहर के एस.बी.एस. मैदान पर होता है। कन्नौज में ग्वाल मैदान और एस.बी.एस. कॉलेज मैदान में दोनों ही स्थानों पर शरद पूर्णिमा के दिन ही रावण का पुतला जलाया जाता है। दोनों ही स्थानों पर एक साथ अक्टूबर माह में गणेश पूजन के साथ रामलीला मंचन की शुरुआत की जाती है और करीब 15 दिन तक अलग-अलग मंचन होते हैं। लेकिन रामबारात दोनों ही रामलीला की अलग-अलग दिन निकलती है। ग्वाल मैदान रामलीला में एक दिन पहले रामबारात निकाली जाती है तो वही एसबीएस मैदान में एक दिन बाद।

छतों पर खीर रखकर सुबह खाते हैं लोगः जानकारों की मानें तो शरद पूर्णिमा के दिन रावण का पुतला फूंकने के पीछे मान्यता है कि इसी दिन रावण का अंत हुआ था। भगवान राम ने दशहरा के दिन युद्ध करते हुए रावण की नाभि पर तीर मारा था लेकिन वह शरद पूर्णिमा तक जीवित रहा। इस बीच राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञान लेने के लिए भेजा तो शरद पूर्णिमा के दिन अमृत वर्षा हुई। इसी वजह से अभी भी शरद पूर्णिमा के दिन लोग रात में छतों पर खीर रखकर सुबह खाते हैं।

शरद पूर्णिमा को अमृत वर्षा की परम्परा से जुड़ा है यह राजः अक्सर शरद पूर्णिमा को लोग आस्था और विश्वास के साथ खीर बनाकर खुले आसमान की नीचे रखते है ताकि उस खीर में अमृत वर्षा का अंश पड़ जाए। कान्यकुब्ज ब्राहम्णों का मत है कि रावण के जो प्राण निकलते थे, वह शरद पूर्णिमा के दिन ही निकले थे और रावण की नाभि में भरा हुआ अमृत फैल गया और वही अमृत पाने के लिए आज भी परंपरा चली आ रही है कि लोग शरद पूर्णिमा को खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखते है ताकि वह खीर अमृत के सामान बन जाए।

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