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100 साल पुराने इस मंदिर में होती है रावण की पूजा, साथ विराजते हैं भगवान शंकर

भारतीय संस्कृति में रावण को बुराई का प्रतीक माना गया है, इसलिए रावण की पूजा नहीं की जाती है।

बदांयू के इस मंदिर में स्थापित सभी देवी-देवताओं की प्रतिमा के मुकाबले रावण की प्रतिमा सबसे छोटी है।

हिंदू धर्म में रावण को शुभ नहीं माना जाता है, उसे एक राक्षस की तरह दिखाया जाता है क्योंकि मान्यता है कि उसने माता सीता का अपहरण कर लिया था और उन्हें लंका ले गए थे। भारत में उसकी पूजा को अशुभता का कारण माना जाता है लेकिन कई लोग हैं जो रावण की पूजा करते हैं और उन्हें अपने इष्ट की तरह पूजते हैं। भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में एक मंदिर है जहां रावण की पूजा की जाती है। जहां दशहरे के दिन पूरे देश में रावण को जलाकर सच्चाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, वहां बदांयू के इस मंदिर के कपाट बंद रखे जाते हैं। इस मंदिर की स्थापना करीब 100 साल पहले की गई थी। इस मंदिर में पूजा अर्चना सबसे पहले पूजारी बलदेव रावण को प्रकाण्ड विद्वान और अद्वितीय शिवभक्त मानकर करते थे। उनकी देखादेखी कई और लोगों ने भी मंदिर आकर पूजा शुरू कर दी। इस मंदिर में रावण की आदमी के कद की प्रतिमा स्थापित है, जिसके नीचे शिवंलिग प्रतिष्ठापित किया गया है। मंदिर के दायीं तरफ भगवान विष्णु की प्रतिमा है।

मंदिर में रावण की प्रतिमा को भगवान शिव की आराधना करते हुए स्थापित किया गया है। इस मंदिर में रावण के अतिरिक्त जितने भी देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं, उनका आकार रावण की प्रतिमा से काफी कम है। पूरे उत्तर भारत में सम्भवत: यही एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां रावण की पूजा होती है। समाजसेवी डाक्टर विष्णु प्रकाश मिश्र बताते हैं कि मंदिर की स्थापना करने वाले पंडित बलदेव का तर्क था कि रावण बहुत ज्ञानी था। वह जानता था कि माता सीता लक्ष्मी जी का और श्री राम भगवान विष्णु के अवतार हैं, इसलिये वह भक्ति के लिये सीता माता का हरण कर लिया था, ताकि लंका में सुख-समृद्धि सदा कायम रहे। उन्होंने बताया कि बलदेव मानते थे कि रावण ने इसलिये माता सीता को अपने महल में ना रखकर अशोक वाटिका जैसे पवित्र स्थान पर ठहराया था और उनकी सुरक्षा के लिये केवल स्त्रियों को ही तैनात किया गया था। इसी तर्क को रावण की पूजा करने वाले आज तक मानते चले आ रहे हैं।

मंदिर के पास रहने वाली पुजारिन रश्मि वर्मा ने बताया कि लोग रावण की पूजा अक्सर चोरी-छुपे ही करते हैं। चूंकि भारतीय संस्कृति में रावण को बुराई का प्रतीक माना गया है, शायद इसलिये वे ऐसा करते हैं। उन्होंने बताया कि विजय दशमी के दिन रावण के इस मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद रहते हैं और रावण को आदर्श मानने वाले लोग इस दिन अपने घर में कोई खुशी भी नहीं मनाते। रश्मि ने कहा कि भारत एक धर्म प्रधान देश है। देश के अलग-अलग प्रान्तों में कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं। पूजा भले ही अलग-अलग देवी देवताओं की होती हो, लेकिन पूजा दरअसल देवत्व गुणों की ही होती है।

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