रमजान के मुकद्दस महीने का हर दिन और हर रात अहम है। इस्लाम में रमज़ान को तीन अशरा में बांटा गया है, पहला अशरा रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत का और तीसरा अशरा निजात पाने का होता है। इन तीनों अशरा में सबसे ज्यादा अहमियत आखिरी अशरा की होती है। रमजान के आखिरी दस दिनों को आखिरी अशरा कहा जाता है। इन दस दिनों की इबादत अल्लाह से नज़दीकी बढ़ाने का ज़रिया है। ये अशरा आध्यात्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान ‘ऐतेकाफ’ (Itikaf) की इबादत की जाती है। ऐतेकाफ की इबादत के बारे में जानने से पहले ये समझना जरूरी है कि आखिर ऐतेकाफ कहते किसे हैं?
एतेकाफ क्या है और इसकी इबादत से क्या मतलब है?
एतेकाफ का अर्थ है खुद को दुनिया के तमाम कामों से अलग कर अपना दिन और रात सिर्फ खुदा की इबादत में समर्पित करना है। आखिरी अशरा की ये इबादत इंसान पर सबसे ज्यादा बदलाव लाती है। अगर इस अशरा में ठीक से इबादत की जाए तो इंसान सब्र करना और खुद पर काबू पाना सीख लेता है। रमजान के मुबारक महीने में ऐतेकाफ एक खास इबादत है, जिसमें मुसलमान रमजान के आखिरी दस दिनों में मस्जिद में रहकर पूरी तरह अल्लाह की इबादत में मशगूल रहता है। ऐतेकाफ में बैठने वाला शख्त पांच वक्त की नमाज, कुरान की तिलावत,हदीस और अल्लाह के जिक्र में अपना दिन रात गुजारता है। रमजान में एतेकाफ में बैठना दुनियावी कामों से अलग होकर रूहानी ताज़गी पाने और अल्लाह से नज़दीकी बढ़ाने का ज़रिया है।
कुरान में एतेकाफ़ का जिक्र
कुरआन में भी एतेकाफ़ का ज़िक्र सूरह अल-बक़रह में किया गया है। कुरान में एतिकाफ में बैठने की अहमियत साबित होती है। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर साल रमजान के आखिरी दस दिनों में एतिकाफ किया करते थे, जिससे ये इबादत सुन्नत इबादत बन गई।
ऐतेकाफ की अहमियत
इतिकाफ में बैठकर शबे कद्र की तलाश होती है। रमजान के आखिरी अशरे में लैलतुल क़द्र होती है, जो हजार महीनों से बेहतर रात होती है। ऐतेकाफ इस मुबारक रात को पाने का बेहतरीन मौका देता है। इस रात की इबादत से दुआ और तौबा का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। माना जाता है कि गुनाहों से तौबा मांगने के लिए ये रात सबसे अव्वल है। ये वक्त खुदा की इबादत करने के लिए और सच्चे दिल से इबादत करने और तौबा करने का होता है। इस दौरान एतिकाफ में बैठने वाला शख्स दुनिया से दूरी, दीन से जुड़ाव, भागदौड़ भरी जिंदगी से हटकर अल्लाह की याद में दिल और दिमाग को सुकून देता है। दस दिनों तक दुनियादारी से दूर होकर इंसान सब्र और अनुशासन में जीना सीखता है। ऐतेकाफ इंसान को सब्र, कम बोलने और अपने नफ्स पर काबू रखने की आदत सिखाता है।
ऐतेकाफ किसके लिए है जरूरी?
ऐतेकाफ सुन्नत-ए-मौअक्कदा किफाया है। यानी अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद में एक व्यक्ति भी ऐतेकाफ कर ले तो सबकी तरफ से सुन्नत अदा हो जाती है। हालांकि हर मुसलमान बालिग मर्द और औरत के लिए ऐतेकाफ करना अच्छा है। मर्द मस्जिद में एतकाफ करते हैं तो औरतें घर में तय जगह पर ऐतेकाफ कर सकती हैं।
रमजान में एतेकाफ से क्या हासिल होता है?
एतेकाफ़ सिर्फ मस्जिद में बैठना नहीं, बल्कि दिल और दिमाग को अल्लाह की तरफ मोड़ने का नाम है। एतेकाफ़ रमजान का सबसे रूहानी अमल है जो इंसान को गुनाहों से पाक होकर नई शुरुआत करने का मौका देता है।
डिस्क्लेमर:
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और इस्लामी परंपराओं पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी विभिन्न इस्लामी स्रोतों और मान्यताओं के अनुसार प्रस्तुत की गई है। अलग-अलग फिरकों (मतों) और विद्वानों की राय में कुछ भिन्नता संभव है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी धार्मिक अमल को अपनाने से पहले अपने स्थानीय उलेमा या जानकार धार्मिक विद्वान से सलाह अवश्य लें। यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
