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धर्म दीक्षा: रघुपति राघव राजाराम…

कालिदास के रघुवंश में भी मथुरा का उल्लेख है। रघुवंश में इसे मधुरा नाम से पुकारा गया तथा शत्रुघ्न द्वारा स्थापित किए जाने के बारे में भी विस्तार से लिखा गया है। भगवान राम को विष्णु का अवतार माना जाता है। वराह पुराण में भगवान विष्णु कहते हैं कि इस ब्रह्मांड कोई ऐसा स्थान नहीं है जो मथुरा के समान उन्हें प्यारा हो। मथुरा उनके लिए मुक्तिदायक है और इससे अधिक प्रिय उन्हें कोई अन्य स्थल नहीं लगता है।

Author Published on: March 30, 2020 2:16 AM
रामनवमी पर देशभर में भगवान राम का जन्मोत्सव उल्लास से मनाया जाता है।

शास्त्री कोसलेन्द्रदास
रामायण का प्रथम शब्द है तप। श्रीराम की जीवनी तप को प्रतिष्ठित करती है, जिसमें मानवीय स्तर पर एक से एक करुणाजनक दृश्य और चेहरे उपस्थित होते हैं। इनके भीतर सूर्य तप रहा है और उन्हें मधुमय बना रहा है। इन दृश्यों और पात्रों से गुंथा ग्रंथ रामायण है, जो श्रीराम की अमर गाथा है। श्रीराम सरयू किनारे बसी अयोध्या में राजा दशरथ और रानी कौशल्या की दुलारी गोद में उतरते हैं। चैत्र माह की उजियाली नवमी को मध्याह्न में जन्मे राम जगत के प्रकाशक हैं।

रामचरितमानस कहती है कि नवजात शिशु राम को देखने सूर्य एक मास तक हिले ही नहीं, पूरा महीना एक दिन में बदल गया। उनका चरित अगाध गुणों का समुद्र है, जिसमें ऋषि-योगी व भक्त-संत मोती चुनते हैं। राम मर्यादा, धर्म, उपकार, सत्य, दृढ़ प्रतिज्ञा तथा चरित्र शुचिता के अनुपम प्रतिमान हैं। वे इतिहास के सबसे अधिक प्रकाशित तेजोमय महानक्षत्र, जिनके प्रकाश से सारे चर और अचर चमक रहे हैं।

एक राम, अनेक काम
एक राम के भीतर अनेक राम छुपे हैं। विश्वामित्र के यज्ञरक्षक राम, शास्त्रज्ञ वाल्मीकि और ऋषि भरद्वाज के ब्रह्म राम, कौल-भील-किरात-निषाद के सखा राम, भाई भरत के आराध्य राम, गिद्ध जटायु के ईश्वर राम, माता शबरी के नयनसुख राम, सुग्रीव के मित्र राम, हनुमान के स्वामी राम, रावण के संहारक राम तो राक्षस विभीषण के भी प्रतिपालक राम। भागवत महापुराण के अनुसार श्रीराम ने अपना अवतार मनुष्य जाति को चरित्र-शिक्षण देने में लगाया।

एक बात, एक बाण, एक पत्नी
उनका अवतार काल माता-पिता, बंधु-बांधव, परिवार, राजा-प्रजा और नारी के प्रति सम्मान को प्रकट करता है। श्रीराम जो विचारते हैं, वह कहते हैं। जो कहते हैं, वह करते हैं। वे मन, वचन और कर्म में एकरूप हैं। कथन की अपेक्षा कर दिखाना, अधिक विश्वसनीय होता है। कथन मिथ्या हो सकता है पर जिया हुआ जीवन एक तथ्य है, जिसे नकारा नहीं जा सकता।

राम हरेक मानव को प्रभावित करते हैं। राम का प्रभाव किसी के कथन पर नहीं बल्कि उनके जीवन के सत्य पर आधारित है। श्रीराम के चरित की विशेषता है कि वे एक ही बात बोलते हैं। एक ही बाण से शत्रुओं का नाश करते हैं और एकपत्नीव्रत धारण करते हैं। कैकेयी जब कहती है कि राम, तुम निश्चित ही वन चले जाओगे ना? वे माता कैकेयी से कहते हैं, राम दो बात नहीं बोलता। मैंने वन में जाने का जो वचन दिया, उसे अवश्य ही पूरा करूंगा।

धर्म के रूप हैं राम
भारत की संस्कृति को पहचानने वाला चेहरा श्रीराम का है। उनकी जीवनगाथा ‘रामायण’ हमारी अमर परंपरा का आधार है। श्रीराम का जीवन चरित्र होने से ‘रामायण’ आज तक भारतीय समाज की चेतना का महाकाव्य है। किसी भी पंथ, परंपरा, भाषा, राष्ट्र तथा संस्कृति में रामायण जैसा ग्रंथ किसी के पास है ही नहीं। भारत के हरेक नर-नारी को अपने चरित्र के नायक-नायिका के रूप में देखने के लिए राम और सीता प्राप्त हैं। महर्षि वाल्मीकि की उद्घोषणा है रामो विग्रहवान् धर्म: अर्थात श्रीराम धर्म के साक्षात विग्रह हैं।

सीतापति रघुनंदन राम
नारी के शील, मर्यादा और अस्तित्व को श्रीराम ने अपार सम्मान दिया। श्रीराम को अपने पूरे अवतार काल में मात्र तीन बार ही क्रोध आता है। पहली बार तब जब दुराचारी राक्षस रावण माता सीता को हरकर ले जाता है। रघुवंशी राम की आंखें दूसरी बार तब लाल होती हैं जब वे अपनी प्राणप्रिया पत्नी सीता को रावण से मुक्त करवाना चाहते हैं और लंका तक जाने के लिए समुद्र उन्हें मार्ग नहीं देता। तीसरा अवसर तब है जब माता जानकी राजा राम और लव-कुश को छोड़कर धरती में समा जाती है।

दाम्पत्य का महाकाव्य रामायण
रामायण पवित्र दाम्पत्य जीवन का महाकाव्य है। आज जब पाश्चात्य संस्कृति हावी है, पाश्चात्यों का समृद्ध समाज ही आदर्श बन चुका है। इसलिए रामायण को आदर्श होना जरूरी है। जहां परकीया रति के स्थान पर इतना उज्ज्वल चरित्र हमारे सामने हो कि दाम्पत्य में किसी दूसरे के लिए कोई स्थान न हो। राम के जीवन में परकीया रति नहीं है। राम सिर्फ सीता के लिए और सीता सिर्फ राम के लिए है। उनके अवतार में काम का प्रलोभन और अवदमन दोनों ही नहीं है।

गांधी के राजाराम
राम और सीता का चरित पूणर्त: मानवीय हैं। जिसमें एक राजकुमार युवावस्था से दुख भोगता हुआ राजा बनने के बाद भी दुख ही जीता रहता है पर न्याय के पथ से जरा भी विचलित नहीं होता! इसी नाते महात्मा गांधी राम के भक्त हैं। उन्होंने भारत में राम राज्य की कल्पना इसीलिए की थी, जिसमें राजा नहीं बल्कि प्रजा मुख्य है।

भक्तों के जीवनाधार
मन के राम, सब के रामराम सगुण भक्तिधारा के भक्तों के ही जीवनाधार हैं। निर्गुण धारा के संत भी निर्गुण ब्रह्म राम में खोजते हैं। रामानुजाचार्य से लेकर रामानंदाचार्य और गोस्वामी तुलसीदास वहीं दूसरी ओर महात्मा कबीर से लेकर रैदास, धन्ना, नानक, दादू और रामचरण रामस्नेही जैसे भक्त राम को पाकर हमारे आराध्य व श्रद्धा के केंद्र आज तक बने हुए हैं। राम चरित का जादू है कि घर में संतान जन्मे तो राम जन्म के गीत और विवाह हो तो वर-वधू में राम-सिया की जोड़ी के दर्शन तथा अंत में भी उन्हीं राम का नाम। उनका जीवन और नाम, दोनों भक्तों के जीवन का आधार है।

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