राम भक्ति से सराबोर मरुस्थल

थार मरुस्थल के केंद्र बिंदु जैसलमेर शहर की रंग बिरंगी संस्कृति और धरोहरें इसके भव्य और वैभवशाली अतीत की साक्षी हैं।

सांकेतिक फोटो।

राज सिंह

थार मरुस्थल के केंद्र बिंदु जैसलमेर शहर की रंग बिरंगी संस्कृति और धरोहरें इसके भव्य और वैभवशाली अतीत की साक्षी हैं। इसके किले, दुर्ग, हवेलियां और झील इस मरुभूमि को एक दर्शनीय स्थल बनाते हैं। लेकिन थार मरुस्थल का यह गौरवमयी इतिहास केवल किले, हवेलियां और दुर्ग तक सीमित नहीं है। इसकी आध्यात्मिक संस्कृति और भी अधिक सुदृढ़ रही है।

350 वर्ष पूर्व बेशक यहां पर पानी यातायात एवं कृषि के अभाव में मानव जीवन बेहद कठिन था लेकिन मरुस्थल के भक्ति भाव में कोई कमी नहीं थी। 17 वीं शताब्दी में भी जैसलमेर का यह थार मरुस्थल राम भक्ति से सराबोर था। राम भक्ति के प्रचार के लिए 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही जैसलमेर के रेगिस्तान में रामानंदी संतों ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कर उसे रामकुंडा का नाम दे दिया था।

12वीं और 13वीं शताब्दी में विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत का भरपूर आर्थिक शोषण किया और 14वीं तथा 15वीं शताब्दी में सनातन धर्म का दमन करने की नीतियां आरंभ हो गई। भक्ति काल में साधु संतों ने न केवल सैन्य संगठन बनाकर मंदिरों और मठों की रक्षा करने का प्रयास किया बल्कि धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए धार्मिक संप्रदायों का सशक्त संगठन तैयार किया। यद्यपि स्वामी रामानुज द्वारा स्थापित श्री संप्रदाय का प्रभाव दक्षिण भारत में ही अधिक रहा परंतु 15 वीं शताब्दी के आते आते कई वैष्णव संप्रदाय उत्तर भारत में सशक्त संगठन तैयार कर चुके थे। स्वामी रामानुज द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को उत्तर भारत में स्वामी रामानंद जी ने आगे बढ़ाया और विष्णु भक्ति के साथ साथ राम भक्ति का प्रचार प्रसार आरंभ हुआ।

देशभर में 36 रामानंदी मठों की स्थापना हुई। इनमें से अधिकतर राजस्थान, पंजाब, बिहार और मध्य प्रदेश में स्थापित किए गए। इन 36 रामानंदी मठों को द्वारे का नाम दिया गया और इन द्वारों के अधीन सैकड़ों उपद्वारे, अस्थल एवं मंदिर स्थापित किए गए। इन धार्मिक स्थानों का निर्माण शहरों की घनी बस्ती एवं ग्रामीण अंचल तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि कई ऐसे दुर्गम स्थानों पर भी मंदिरों का निर्माण किया गया जहां मानव जीवन यापन भी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में था।

रामानंदी मठों की स्थापना के इस क्रम में बिहार में भी कई मठों की स्थापना हुई और स्वामी रामानंद जी के शिष्य स्वामी योगानंदाचार्य जी ने बिहार में आरा नामक स्थान पर एक मठ की स्थापना की। बिहार के मध्य में स्थित इस मठ के संतों का कार्य क्षेत्र केवल बिहार तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने देश में अनेक स्थानों पर राम भक्ति का प्रचार करने हेतु मंदिरों की स्थापना की। जैसलमेर का रामकुंड मंदिर भी उन्हीं में से एक है।

उन दिनों वैष्णव धर्म की दीक्षा के उपरांत साधु संत 52 वैष्णव मठों और प्रमुख वैष्णव मंदिरों के दर्शन के लिए देश भर का भ्रमण करते थे। थार मरुस्थल में स्थित रामकुंडा नाम का यह मंदिर भी उन स्थानों में से एक था जहां हर वर्ष सैकड़ों साधु संत अपनी धार्मिक आस्था को संतुष्ट करते थे। सनातन धर्म को हर स्थान और हर जाति तक पहुंचाना रामानंदी संप्रदाय का लक्ष्य था। इसलिए रामानंदी संतो ने अत्यंत दुर्गम स्थानों को भी धार्मिक आस्था और राम भक्ति से वंचित नहीं रखा।

जैसलमेर से पाकिस्तान सरहद की तरफ जाने वाले रास्ते पर शहर से 12 किलोमीटर दूर स्थित भगवान राम का यह मंदिर योगानंदी द्वारे का उप द्वारा है और रामकुंडा के नाम से प्रसिद्ध है। इस मठ की स्थापना स्वामी अनंतराम नाम के एक रामानंदी संत ने वर्ष 1662 में राजा अमर सिंह के सहयोग से की थी। राजा अमर सिंह के भाई राज सिंह के निवेदन पर अनंत राम जी जैसलमेर आए थे। इस मठ में भगवान विष्णु का मंदिर और राम दरबार स्थापित है। सनातन धर्म की शिक्षा हेतु एक गुरुकुल भी स्थापित किया गया था।

स्वामी अनंतराम, आचार्य गोपाल दास के शिष्य थे और स्वामी योगानंदाचार्य जी की परंपरा से संबंध रखते थे। स्वामी अनंतराम जी राजा अमर सिंह के राजगुरु भी थे।राम नवमी के दिन रामकुंडा में एक विशाल मेला लगता है जिसमें जैसलमेर और आसपास के इलाके के हजारों लोग शामिल होते हैं। दिवाली के दिन इस मंदिर में विशेष पूजा अर्चना की जाती है।

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