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Pradosh Vrat Udyapan Vidhi: ये है प्रदोष व्रत के उद्यापन की विधि, जानिए इस दौरान क्या करें और क्या नहीं

Pradosh Vrat Udyapan Vidhi: शुक्रवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत भृगुवारा प्रदोष कहलाता है। इस दिन व्रत रखने से धन-वैभव और सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है।

Author नई दिल्ली | June 14, 2019 12:10 PM
भगवान शिव और पार्वती।

Pradosh Vrat Udyapan Vidhi: प्रदोष व्रत का पालन अगर सही तरीके से किया जाए तो भक्तों को शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। शास्त्रों की मान्यताओं के अनुसार हर दिन के प्रदोष व्रत का अलग-अलग महत्व है। सोमवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष कहा जाता है। इस दिन किए जाने वाले व्रत से भक्तों को इच्छा के अनुसार फल प्राप्त होता है। मंगलवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोष कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है। वहीं बुधवार के दिन प्रदोष व्रत पड़ने से इसे सौम्यवारा प्रदोष व्रत कहा जाता है। यह प्रदोष व्रत ज्ञान और विद्या की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

इसके अलावा गुरुवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को गुरुवारा प्रदोष व्रत कहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से शत्रुओं से छुटकारा मिलता है। शुक्रवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत भृगुवारा प्रदोष कहलाता है। इस दिन व्रत रखने से धन-वैभव और सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है। वहीं शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत शनि प्रदोष कहलाता है। इसे नौकरी में उन्नति पाने के लिए किया जाता है। साथ ही साथ रविवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भानु प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से जीवन में सुख-शांति और लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है।

प्रदोष व्रत उद्यापन-विधि: प्रदोष व्रत का उद्यापन त्रयोदशी तिथि को ही की जाती है। इसके लिए व्रती को त्रयोदशी तिथि के दिन स्नान आदि से निवृत होकर साफ कपड़े पहनने चाहिए। इसके बाद रंगीन स्वच्छ वस्त्रों से भगवान शिव की चौकी सजाना चाहिए। अब उस चौकी पर सबसे पहले भगवान गणेश की प्रतिमा रखें और फिर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा भी रखें। इसके बाद धूप, दीप, गंध, पुष्प आदि से पूरे विधि-विधान के साथ इनकी पूजा करें। पूजन के बाद हवन करना भी अनिवार्य माना गया है, हवन के दौरान ‘ॐ उमा सहित शिवाय नमः’ इस मंत्र का 108 बार जाप करें। उसके बाद भगवान की आरती करें। पूजन के अंत में किसी योग्य पंडित को भोजन कराकर दान आदि दें। फिर पूरे परिवार सहित भगवान शिव और ब्राह्मणों का आशीर्वाद लेकर प्रसाद ग्रहण करें।

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