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प्रदोष व्रत के दिन इस पाठ से प्रसन्न होते हैं शिव, सुख-सौभाग्य का वरदान मिलने की है मान्यता

मान्यता है कि जो व्यक्ति शिव प्रदोष व्रत (Shiv Pradosh Vrat) सच्चे मन से रखता है भगवान शिव स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। यह व्रत शिव कृपा पाने के लिए अद्भुत माना गया है।

shiv pradosh vrat, shiv pradosh vrat 2020, shiv shivashtakप्रदोष व्रत के दिन जो व्यक्ति भगवान शिव के शिवाष्टक (Shivashtak) का पाठ करता है उसे सुख-समृद्धि का वरदान प्राप्त होता है।

Shivashtakam Stotra/ Shiv Shivashtak in Hindi : प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव (Pradosh Vrat Shiv Ji) की उपासना की जाती है। इस व्रत को बहुत प्रभावशाली माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन जो व्यक्ति व्रत करता है उसके सभी दुख दूर होते हैं। यह व्रत बहुत प्रभावशाली माना गया है। सभी शिव भक्तों को यह व्रत करना चाहिए। इस बार प्रदोष व्रत 15 सितंबर, मंगलवार (Pradosh Vrat September 2020) के दिन रखा जाएगा।

मान्यता है कि जो व्यक्ति शिव प्रदोष व्रत (Shiv Pradosh Vrat) सच्चे मन से रखता है भगवान शिव स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। यह व्रत शिव कृपा पाने के लिए अद्भुत माना गया है। कहते हैं कि जब सभी देवी-देवताओं ने त्रयोदशी तिथि को अच्छा न मानकर त्याग दिया था। तब शिव जी ने इस तिथि को अपनाया था। भगवान शिव इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों का हाथ हमेशा पकड़ कर रखते हैं। शिव जी को बहुत भोला और आशुतोष माना जाता है इसलिए वह अपने भक्तों के अपराधों को भी बहुत जल्दी क्षमा कर देते हैं।

हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक हर महीने के दोनों पक्षों में की त्रयोदशी तिथि (Shiv Pradosh Vrat Kab Hai) को यह व्रत किया जाता है। यह व्रत महीने में दो बार आता है। भगवान शिव के भक्त इस दिन उपवास रखते हैं। कहते हैं कि इस दिन व्रत रखने से भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। साथ ही ऐसा माना जाता है कि प्रदोष व्रत के दिन जो व्यक्ति भगवान शिव के अष्टक यानी शिवाष्टक (Shivashtak) का पाठ करता है उसे सुख-समृद्धि का वरदान प्राप्त होता है।

शिवाष्टक स्तोत्र
॥ अथ श्री शिवाष्टकं ॥
प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजम् ।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥

गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् ।
जटाजूटगङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शम्भमीशानमीडे॥

मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डलं भस्मभूषाधरं तम् ।
अनादिह्यपारं महामोहहारं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥

वटाधोनिवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदासुप्रकाशम् ।
गिरीशं गणेशं महेशं सुरेशं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥

गिरिन्द्रात्मजासंग्रहीतार्धदेहं गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्नगेहम् ।
परब्रह्मब्रह्मादिभिर्वन्ध्यमानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥

कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदाम्भोजनम्राय कामं ददानम् ।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥

शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्द पात्रं त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम् ।
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥

हरं सर्पहारं चिता भूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारम् ।
श्मशाने वसन्तं मनोजं दहन्तं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥

स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणे पठेत् सर्वदा भर्गभावानुरक्तः ।
स पुत्रं धनं धान्यमित्रं कलत्रं विचित्रं समासाद्य मोक्षं प्रयाति॥
॥ इति शिवाष्टकम् ॥

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