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प्रदोष व्रत: भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए करें ये व्रत, जानिए क्या है पूजा विधि

प्रदोष व्रत का समय सूरज के डूबने के बाद 2 घंटे 24 मिनट तक रहता है। इसी काल को प्रदोष काल कहा जाता है।

जानिए क्या है प्रदोश काल व्रत और उसकी पूजा विधि।

प्रदोष व्रत भगवान शिव के लिए किया जाता है। इस व्रत को बहुत ही फलदायक माना जाता है। इस व्रत को करने वाली स्त्री अपनी हर मनोकामना को पूरा कर सकती है। इस व्रत का महत्व तभी है जब इसे प्रदोष काल में किया जाए। सूरज डूबने के बाद और रात के होने से पहले के पहर को सांयकाल कहा जाता है। इस पहर को ही प्रदोष काल कहा जाता है। इस व्रत को करने वाली महिलाओं की इच्छाएं भगवान शिव पूरी करते हैं। प्रदोष व्रत हर माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को किया जाता है। 15 दिसंबर को पौष माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है और इस दिन प्रदोष का व्रत किया जाता है।

प्रदोष व्रत की पूजा विधि-
इस दिन का व्रत भगवान शिव की अराधना में किया जाता है। प्रदोष का व्रत निर्जला व्रत होता है। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं बिना जल ग्रहण किए व्रत करती हैं। त्रयोदशी के दिन पूरे दिन व्रत करने के बाद प्रदोष काल में स्नान किया जाता है। इसके बाद साफ और सफेद रंग के कपड़े पहनकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान शिव का पूजन किया जाता है। पूजा के लिए रंगीन वस्त्रों से भगवान की चौंकी सजाएं। इस दौरान सबसे पहले गणेश की पूजा करें और उसके बाद शिव-पार्वती की पूजा करें। इस दिन व्रत करने वाले हवन करें। पुराणों के अनुसार ऊं उमा सहित शिवाय नमः का 108 बार जप अवश्य करें। इसके बाद भगवान की आरती करके सभी में प्रसाद का वितरण करें।

प्रदोष व्रत का समय सूरज के डूबने के बाद 2 घंटे 24 मिनट तक रहता है। इसी काल को प्रदोष काल कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस अवधि के बीच भगवान शिव कैलाश पर्वत में प्रसन्न होकर नृत्य करते हैं। इस दिन व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। शिव की अराधना करके उन्हें प्रसन्न करना बहुत सरल होता है। भगवान शिव को भोलेनाथ इसलिए ही कहा जाता है कि हर कोई उन्हें प्रसन्न कर लेता है। लेकिन जब उन्हें क्रोध आता है तो सृष्टि का नष्ट होना तय हो जाता है।

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