Padmini Ekadashi Vrat Katha: अधिक मास में आने वाली पद्मिनी एकादशी का सनातन धर्म में विशेष महत्व माना गया है। यह एकादशी भगवान भगवान विष्णु को समर्पित होती है और मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत, पूजा और कथा का पाठ करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं। पद्मिनी एकादशी की सबसे अहम विशेषत यह है कि, यह मलमास में पड़ती है, जिस कारण प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार ही पद्मिनी एकादशी का संयोग बनता है। इस साल यह एकादशी 27 मई को मनाई जाएगी। वहीं इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ व्रत कथा पढ़ना जरूरी होता है। वर्ना पूजा अधूरी मानी जाती है। आइए जानते हैं इस दिन कौन सी कथा पढ़ना जरूरी होता है।
अधिकमास पद्मनी एकादशी व्रत कथा (Padmini Ekadashi Vrat Katha 2026)
प्राचीन समय में त्रेतायुग में कार्तवीर्य नामक एक महान राजा राज्य करते थे। वे बहुत पराक्रमी और धर्मात्मा थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा और उनकी पत्नी रानी पद्मिनी अत्यंत दुखी रहते थे। राजा ने अनेक यज्ञ, दान और पूजा-पाठ किए, लेकिन उन्हें पुत्र प्राप्ति नहीं हुई।
एक दिन राजा ने राज्य का भार मंत्रियों को सौंप दिया और अपनी पत्नी पद्मिनी के साथ वन में तपस्या करने चले गए। दोनों ने वर्षों तक कठोर तप किया। राजा कार्तवीर्य ने हजारों वर्षों तक भगवान विष्णु की आराधना की, लेकिन फिर भी उन्हें कोई वरदान प्राप्त नहीं हुआ। तपस्या के कारण राजा का शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया।
रानी पद्मिनी अपने पति की ऐसी अवस्था देखकर चिंतित रहने लगीं। एक दिन वे वन में भ्रमण करते हुए महान पतिव्रता अनसूया माता के आश्रम पहुंचीं। रानी ने माता अनसूया को प्रणाम किया और विनम्रता से अपनी पीड़ा सुनाई।
माता अनसूया का उपदेश
रानी पद्मिनी की भक्ति और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर माता अनसूया ने कहा—
“हे देवी! अधिकमास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। यदि आप इस व्रत को विधिपूर्वक करें और भगवान विष्णु की आराधना करें, तो निश्चित ही आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।”
माता अनसूया ने रानी को व्रत की संपूर्ण विधि बताई। रानी पद्मिनी ने अत्यंत श्रद्धा और नियमपूर्वक पद्मिनी एकादशी का व्रत किया। उन्होंने पूरी रात जागरण किया, भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन किए और द्वादशी तिथि में ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दी।
भगवान विष्णु का प्रकट होना
रानी पद्मिनी की कठोर भक्ति और व्रत से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। वे गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए और बोले—
“हे देवी! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं। वर मांगो।”
रानी ने हाथ जोड़कर कहा-
“प्रभु! मेरे पति को ऐसा तेजस्वी और बलवान पुत्र प्राप्त हो, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो।”
भगवान विष्णु ने “तथास्तु” कहा और अंतर्ध्यान हो गए।
कुछ समय बाद रानी पद्मिनी ने एक अत्यंत पराक्रमी पुत्र को जन्म दिया। वही पुत्र आगे चलकर कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कहा जाता है कि उसमें हजार भुजाओं का बल था और उसने अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की।
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डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।
