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वट सावित्री व्रत

Vat Savitri Vrat 2021: उत्तर भारत में बरगदाही के नाम से लोकप्रिय वट सावित्री व्रत हिंदू सुहागिनों का एक प्रमुख व्रत है। यह व्रत भारतीय संस्कृति की एक महान नारी पात्र सती सावित्री की ईश निष्ठा, अनूठे बुद्धि कौशल व पतिव्रत धर्म की अद्भुत शक्ति का परिचायक है।

सावित्री की उस महाविजय के उपलक्ष्य में प्राचीनकाल से भारत की सुहागन स्त्रियां अपने पति की दीघार्यु व उत्तम स्वास्थ्य के लिए ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री का व्रत पूजन करती आ रही हैं।

Vat Savitri Vrat 2021: उत्तर भारत में बरगदाही के नाम से लोकप्रिय वट सावित्री व्रत हिंदू सुहागिनों का एक प्रमुख व्रत है। यह व्रत भारतीय संस्कृति की एक महान नारी पात्र सती सावित्री की ईश निष्ठा, अनूठे बुद्धि कौशल व पतिव्रत धर्म की अद्भुत शक्ति का परिचायक है। व्रत से जुड़ी सावित्री-सत्यवान की कथा से हम सब भली भांति परिचित हैं।

सावित्री की उस महाविजय के उपलक्ष्य में प्राचीनकाल से भारत की सुहागन स्त्रियां अपने पति की दीघार्यु व उत्तम स्वास्थ्य के लिए ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री का व्रत पूजन करती आ रही हैं। यह व्रत कहते हैं कि महासती सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही मृत्यु के देवता यमराज से अपने मृत पति का पुनर्जीवन हासिल किया था; तभी से वट वृक्ष हिन्दू समाज में देव वृक्ष के रूप में पूज्य हो गया। तात्विक दृष्टि से विचार करें तो वट पूजन के इस महाव्रत में स्त्री शक्ति की प्रबल जिजीविषा की विजय के महाभाव के साथ हमारे जीवन में वृक्षों की महत्ता व पर्यावरण संरक्षण का पुनीत संदेश भी छुपा है।

हमारे यहां वृक्षों को जीवंत देवताओं की संज्ञा दी गई है। वैदिक मनीषा कहती है कि हवा के झोंकों से झूमते घने छायादार वृक्ष और उनसे गले मिलती लताएं प्रकृति का शृंगार ही नहीं, जीवन का अज्रस स्रोत भी हैं। मत्स्य पुराण में वनों की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कहा गया है-
दशकूपसमावापी, दशवापी समोह्मद:,
दशह्मद सम: पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुम: ।।

अर्थात दस कुएं खोदने का पुण्य एक तालाब बनवाने के बराबर, दस तालाबों के निर्माण का पुण्य एक झील बनवाने के बराबर और दस झीलों के बनवाने का पुण्य एक गुणवान पुत्र के बराबर तथा दस गुणवान पुत्रों का पुण्य एक वृक्ष लगाने के बराबर है। वृक्ष प्रकृति के ऐसे वरदान हैं, जो हमें हरियाली और फल-फूल देने के साथ ही हमारे बेहतर स्वास्थ्य में भी सहयोग करते हैं। इनका न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में अमूल्य योगदान है वरन ये ग्रह व वास्तुदोष भी दूर करते हैं। वृक्ष-वनस्पति के प्रति गहरी श्रद्धा व लगाव भारतीय संस्कृति की अति पुरातन व संवेदनशील परंपरा है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में स्पष्ट उल्लेख है कि शास्त्र, पुराण, उपनिषद्, रामायण आदि के प्रणेता ऋषियों ने आरण्यकों की छांव में अपने आश्रम बनाकर देवदुर्लभ अमूल्य ज्ञान को लिपिबद्ध किया था। वैदिक भारत में लोग वनदेवी की नियमित उपासना करते थे। स्मृति ग्रथों में वन संपदा को नष्ट करने वालों के लिए कठोरदंड विधान मिलता है।

हमारी अरण्य संस्कृति में वट यानी बरगद को सर्वाधिक प्राणवायु प्रदायक, अमरत्व, दीघार्यु और अनंत जीवन के अन्यतम प्रतीक की मान्यता हासिल है। यही वजह है कि प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनियों ने इसकी छाया में बैठकर दीर्घकालीन तपस्याएं की थीं। अब तो विभिन्न शोधों से भी साबित हो चुका है कि प्रचुर मात्रा में प्राणवायु देने वाला यह वृक्ष मन-मस्तिष्क को स्वस्थ रखने व ध्यान में स्थिरता लाने में सहायक होता है।

पाराशर मुनि ‘वट मूले तपोवासा’ कहकर वटवृक्ष की उपयोगिता प्रतिपादित करते हैं। वे कहते हैं कि समूची सृष्टि में एकमात्र वटवृक्ष (बरगद) ही ऐसा है जिसमें त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) की समन्वित शक्ति निहित है। वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है। हिन्दू दर्शन में वट हिन्दू दर्शन में वट वृक्ष दीघार्यु व अमरत्व-बोध का अन्यतम प्रतीक माना जाता है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ‘संबोधि’ अर्थात परम सत्य का बोध हुआ था। इसलिए इसे बोधि वृक्ष भी कहा जाता है। हालांकि बौद्ध धर्मावलम्बियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि वट नहीं वरन पीपल वृक्ष की छाया में उनका परम सत्य से साक्षात्कार हुआ था।

बहरहाल; तार्किक दृष्टि से विचार करने पर प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में ज्येष्ठ मास की तपती धूप से रक्षा के लिए लोग इस विशाल वृक्ष की छाया में आश्रय पाते होंगे और कालान्तर में उसके इस अनुदान के प्रतिदान में वट पूजन की परम्परा शुरू हो गई होगी। मगर; दुर्भाग्यवश आज परिस्थितियां सर्वथा विपरीत हैं।

वनों के प्रति प्यार व श्रद्धा आज सिर्फ चिह्न पूजा मात्र रह गई है। हमने अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए न केवल जंगलों का विनाश कर दिया वरन धरती के आंचल को क्षत-विक्षत करके उसके अंदर बहने वाली जलधारा तक को सुखा दिया। अपनी घोर स्वार्थलिप्सा के कारण हम मनुष्य यह भूल गए हैं कि प्रकृति के ये जड़ देवता हम मनुष्यों पर कितना उपकार करते हैं, हमें कितने तरह के लाभ देते हैं। आइए भूल सुधारें और वट पूजन के इस पर्व पर वनों की महत्ता को सही ढंग से पहचानकर अन्तर्मन से उनको संरक्षित व सम्वर्धित करने का प्रण लें। वस्तुत: वट पूजन की पुरातन सांस्कृतिक परंपरा हमें इस परम हितकारी चिंतनधारा की ओर उन्मुख करती है कि किसी भी परिस्थिति में हमें अपने मूल से नहीं कटना चाहिए और अपना संकल्प बल व आत्मसामर्थ्य सतत विकसित करते रहना चाहिए।

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