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पशुपतिनाथ मंदिर: दुनिया के सांस्कृतिक धरोहरों में यूनेस्को ने किया शामिल, जानें भोलेनाथ के इस मंदिर की खासियत

मंदिर के निर्माण को लेकर किसी प्रकार का प्रमाणित इतिहास नहीं मिलता है। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में करवाया था।

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नेपाल में स्थित भगवान शिव का पशुपतिनाथ मंदिर विश्वभर में प्रख्यात है। इस मंदिर का महत्व अमरनाथ और केदारनाथ से किसी भी तरह से कम नहीं है। पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के किनारे पर स्थित है। ये मंदिर भगवान शिव के पशुपति रुप को समर्पित है। इस मंदिर को यूनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल किया गया है। इस मंदिर को नेपाल का सबसे प्रसिद्ध मंदिर माना जाता है। हिंदू धर्म के 8 पवित्र स्थलों में से एक इस मंदिर को माना जाता है। इस अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ दर्शन के लिए पूरी दुनिया से लोग आते हैं। इस मंदिर की स्थापना को लेकर हर किसी की मान्यता अलग है, माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना तीसरी सदी में हुई थी, लेकिन ऐतिहासिक उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 13 वीं शताब्दी में हुआ था।

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव एक बार बनारस के सभी देवताओं को छोड़कर भगवान शिव यहां चिंकारे का रुप धारण करके जंगलों में निद्रा के लिए चले गए थे। इसके बाद सभी देवता भगवान शिव को खोजकर वापस वाराणसी लाने का प्रयास किया तो शिव ने बचने के लिए नदी के दूसरी तरफ छलांग लगा दी। इसी बीच उनके सींग के चार टुकड़े होकर इस जगह पर गिर गए। इसके बाद इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रुप में यहां पर प्रकट हुए थे। पशुपतिनाथ लिंग विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग में पांचवां मुख है। पशुपतिनाथ के इस लिंग में हर मुखाकृति के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल है। हर मुख अपने अलग-अलग गुण प्रकट करता है। पहले मुख को अघोर मुख कहा जाता है, ये दक्षिण की ओर है। पूर्व की तरफ वाले मुख को तत्पुरुष कहा जाता है। उत्तर मुख को अर्धनारीश्वर कहा जाता है। पश्चिमी मुख को सद्योजात कहा जाता है। ऊपरी मुख को ईशान मुख कहा जाता है। इस मुख को निराकार मुख माना जाता है। यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठ मुख माना जाता है।

मंदिर के निर्माण को लेकर किसी प्रकार का प्रमाणित इतिहास नहीं मिलता है। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में करवाया था। कुछ इतिहासकारों का ये भी मानना है कि पाशुपत सम्प्रदाय को इस मंदिर की स्थापना से जुड़ा मानते हैं। पशुपति काठमांडू घाटी के प्राचीन शासकों के अधिष्ठता देवता रहें हैं। मध्य युग के समय इस मंदिर की तरह ही कई मंदिरों का निर्माण करवाया गया था। माना जाता है कि मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ है। इस समय इसका जो स्वरुप है वो नेपाल के राजा ने 1697 में बनवाया था।

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