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Mata Aarti, Jai Ambe Gauri Aarti, Durga Aarti: जय अंबे गौरी जय श्यामा गौरी… मां जगदम्बे की पूरी आरती पढ़ें यहां

Durga Mata Ki Aarti (Ambe Mata Ki Aarti), skandamata Aarti: जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री...पूरी आरती पढ़ें यहां।

Author नई दिल्ली | Updated: October 4, 2019 5:32 PM
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Navratri 2019, Durga ji ki Aarti, Jai Ambe Gauri, skandamata Puja and Aarti: नवरात्रि का पर्व शुरू हो चुका है। इन दिनों घर-घर मां की उपासना की जा रही है। कई लोग इस दौरान पूरे नौ दिनों तक व्रत रखकर मां अम्बे की अराधना करते हैं। सुबह शाम मां की विधिवत पूजा की जाती है। लेकिन कोई भी पूजा बिना आरती और मंत्रों के अधूरी मानी जाती है। जानिए नवरात्रि में किस आरती और मंत्रों को गाकर माता को किया जाता है प्रसन्न…

मां दुर्गा जी की आरती (Jai Ambe Gauri Aarti) :

जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री ॥टेक॥

मांग सिंदूर बिराजत टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना चंद्रबदन नीको ॥जय॥

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला कंठन पर साजै ॥जय॥

केहरि वाहन राजत खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर मुनिजन सेवत तिनके दुःखहारी ॥जय॥

कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर राजत समज्योति ॥जय॥

शुम्भ निशुम्भ बिडारे महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना निशिदिन मदमाती ॥जय॥

चौंसठ योगिनि मंगल गावैं नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा अरू बाजत डमरू ॥जय॥

भुजा चार अति शोभित खड्ग खप्परधारी।
मनवांछित फल पावत सेवत नर नारी ॥जय॥

कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत कोटि रतन ज्योति ॥जय॥

श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी सुख-सम्पत्ति पावै ॥जय॥

मां दुर्गा के मंत्र (Maa Durga Mantra) : 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी ।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनी ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥2॥

ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणी ॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिकादेवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥5॥

ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥

सर्वबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्याया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्‌॥

देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

शरणागतर्द‍िनार्त परित्राण पारायणे।
सर्व स्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥

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